महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
जननी से देह की वृद्धि होती है, जनक से देह प्रयोजित होती है और स्वयं व स्वजनों से प्रीति-पूर्वक
शिक्षा प्राप्त होती है। जो इन सबका त्याग करता है, वह अधम है (३६)। हे महेशानि ! इन सबके लिए सौ-
सौ कष्ट भी उठाकर यथा-सम्भव इन्हें सदा प्रसन्न रखे, यही सनातन धर्म है (३७) ।
जो मनुष्य पृथिवी पर ब्रह्म-निष्ठ और सत्य-प्रतिज्ञ है, वही महा-पुरुष धन्य है और वही पुरुष परमार्थ
का ज्ञाता है (३८) ।
भार्या की ताड़ना कभी न करे, माता के समान सदा उसका पालन करे। यदि वह साध्वी और पतिव्रता
है तो घोर कष्ट में पड़ने पर भी उसका त्याग न करे (३६)। विज्ञ व्यक्ति अपनी पत्नी के विद्यमान रहते दुष्ट
भाव से पर-स्त्री को छुए तक नहीं अन्यथा अर्थात् छूने से नरक-गामी होगा (४०)। प्राज्ञ व्यक्ति पर-स्त्री के
साथ एकान्त में सोने, रहने और अयुक्त बातचीत करने का त्याग करे और स्त्रियों को वीरता न दिखावे (४१) ।
धन, वस्त्र, प्रेम, श्रद्धा, मधुर वचनों से भार्या को निरन्तर सन्तुष्ट रखे, कभी उससे अप्रिय आचरण न करे
(४२)। सांसारिक तत्त्व का ज्ञाता व्यक्ति उत्सव, लोक-यात्रा, तीर्थ एवं अन्य व्यक्ति के घर में पुत्र अथवा सह-
योगी के साथ बिना उसे कभी न भेजे (४३) । हे महेशानि ! पतिव्रता भार्या जिस पुरुष से सन्तुष्ट रहती है, उसके
सभी धर्म पूर्ण होते हैं अर्थात् ऐसा व्यक्ति सभी धर्मानुष्ठानों से होनेवाले फलों को प्राप्त करता है और तुम्हारा
प्रिय होता है (४४) ।
पिता पुत्र का पालन चार वर्ष तक करे, उसके बाद सोलह वर्ष तक उसे विद्या और सभी गुणों
की शिक्षा दे (४५) । पालन और शिक्षा में बीस वर्ष बीतने पर बीस वर्ष से अधिक आयुवाले पुत्रादि को गृह-
कार्य में लगावे । फिर अर्थात् गृह-कार्य के उपयुक्त होने पर उसे आत्म-तुल्य समझकर उस पर स्नेह प्रकट करे
(४६) । कन्या का भी इसी प्रकार पालन करे और बड़े यत्न से उसे शिक्षा दे। कन्या को धन-रत्न से समन्वित
कर ज्ञानवान् वर को प्रदान करे (४७) । इसी प्रकार गृही भाई, बहन, भांजे, भतोजे, ज्ञाति, मित्र और भृत्यों
(सेवकों) का पालन कर उन्हें सन्तुष्ट करे (४८) । तदनन्तर अर्थात् भाई आदि के पालन में समर्थ होने के बाद
गृहस्थ स्वधर्म में तत्पर एक-ग्राम-वासियों, अभ्यागतों और उदासीन लोगों का भी पालन करे (४६) । हे देवि !
ऐश्वर्य होने पर गृहस्थ यदि इस प्रकार आचरण नहीं करता, तो वह 'पशु' हो माना जाना चाहिए और वह
पापी लोक-समाज में निन्दित होता है। निद्रा, आलस्य, देह के प्रति यत्न, केश-विन्यास, भोजन एवं वस्त्र में
आसक्ति—ये आवश्यकता से अधिक न करे (५०-५१) । गृहस्थ परिमित-भोजी, परिमित-निद्रा, निर्मल-प्रकृति,
परिमित-भाषी, परिमित-मैथुन, नम्र, शुचि, निपुण, निरालस्य और सब कर्मों में तत्पर रहे। शत्रु के सामने शूर
और बान्धव एवं गुरु के पास विनीत रहे । निन्दित व्यक्ति का आदर न करे, सम्मानित लोगों की अवज्ञा न
करे (५२-५३) ।
सहवास और विचार द्वारा व्यक्ति का स्वभाव, सौहार्द, व्यवहार, प्रवृत्ति और प्रकृति जानकर उस पर
विश्वास करे (५४) । बुद्धिमान व्यक्ति क्षुद्र शत्रु होने पर भी उससे शङ्कित रहे और अवसर देखकर ही अपना
भाव प्रकट करे, किन्तु धर्म का लङ्घन न करे (५५) । धर्मज्ञ व्यक्ति अपना यश, पौरुष और जिसे प्रकट करने से
अन्य लोग विरोध करें तथा जो परोपकार के लिए किया गया हो, उसे प्रकाशित न करे (५६) । यशस्वी व्यक्ति
जय की निश्चित सम्भावना होने पर भी कभी लोक-निन्दित कार्य में प्रवृत्त न हो और गुरु या लघु व्यक्ति से
विवाद न करे (५७) । मान-पूर्वक विद्या, धन, यश और धर्म का उपार्जन करे। असत्य, व्यसन (द्यूत-क्रीड़ा
आदि), कुसंग, मिथ्यालाप, पर-द्रोह का त्याग करे (५८) । चेष्टा अवस्था के अनुसार और क्रिया समय के अनुसार
होती है, अतः 'अवस्था' और 'समय' का विचार कर कर्म करे (५६) । गृही लोग योग-क्षेम में अर्थात् अलब्ध