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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 139 में से

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पृष्ठ 54

सातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन । ४५
बाल-ग्रहादि-रोगे च तथा दुःस्वप्न-दर्शने । दुस्तरे सलिले वापि पोते वात-विपद्-गते ॥
विचिन्त्य परमां मायामाद्यां कालीं परात्पराम् । यः पठेच्छत-नामानि दृढ-भक्ति-समन्वितः ॥
सर्वापद्भ्यो विमुच्येत देवि सत्यं न संशयः । न पापेभ्यो भयं तस्य न रोगेभ्यो भयं क्वचित् ॥
सर्वत्र विजयस्तस्य न कुत्रापि पराभवः । तस्य दर्शन-मात्रेण पलायन्ते विपद्-गणाः ॥
स वक्ता सर्व-शास्त्राणां स भोक्ता सर्व-सम्पदाम् । स कर्त्ता जाति-धर्माणां ज्ञातीनां प्रभुरेव सः ॥
वाणी तस्य वसेद् वक्त्रे कमला निश्चला गृहे । तन्नाम्ना मानवाः सर्वे प्रणमन्ति ससम्भ्रमाः ॥
दृष्ट्वा तस्य तृणायन्ते ह्यणिमाद्यष्ट-सिद्धयः । आद्या-काली-स्वरूपाख्यं शत-नाम प्रकीर्त्तितम् ॥
अष्टोत्तर-शतावृत्त्या पुरश्चर्याऽस्य गीयते । पुरस्क्रियान्वितं स्तोत्रं सर्वाभीष्ट-फल-प्रदम् ॥
शतनाम-स्तुतिमिमामाद्या-काली-स्वरूपिणीम् । पठेद् वा पाठयेद् वापि शृणुयाच्छावयेदपि ॥
सर्व-पाप-विनिर्मुक्तो ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ॥
अर्थात् १ ह्रीं-रूपा काली, २ श्रीं-रूपा कराली और ३ क्रीं-रूपा कल्याणी । ४ कलावती, ५ कमला, ६
कलि-दर्प-नाशिनी, ७ महादेव के प्रति कृपा-वती । ८ कालिका, ६ काल-माता अर्थात् काल की भी आदि-भूता,
१० कालानल-सम-द्युति अर्थात् जिनका तेज प्रलय-कालीन अग्नि के समान है, ११ कपर्दिनी, १२ कराल-वदना,
१३ करुणा-रूप अमृत के समुद्र के तुल्य अर्थात् जिनकी करुणा अपार, अपरिमेय और अक्षय है । १४ कृपा-मयी,
१५ कृपाधारा, १६ कृपापारा, १७ कृपागमा अर्थात् जिनकी अपनी कृपा से ही जिन्हें जान सकते हैं । १८ कृशानु
अर्थात् अग्नि-रूपा, १६ कपिला, २० कृष्णा, २१ कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी । २२ काल-रात्रि, २३ काम-रूपा, २४
काम-पाश-विमोचनी अर्थात् काम के बन्धन को काटनेवाली, २५ कादम्बिनी (मेघ-माला-रूपी), २६ कलाधारा,
२७ कलि-पाप-हारिणी । २८ कुमारी-पूजन-प्रीता अर्थात् जो कुमारी-पूजन से प्रसन्न होती हैं, २६ कुमारी-पूज-
कालया अर्थात् कुमारी-पूजन करनेवाले के निकट ही रहती हैं । ३० कुमारी-भोजनानन्दा अर्थात् कुमारियों को
भोजन कराने से आनन्दित होती हैं, ३१ कुमारी-रूप-धारिणी । ३२ कदम्ब-वन-सञ्चारा अर्थात् कदम्ब-वन में
विचरण करती हैं, ३३ कदम्ब-वन-वासिनी, ३४ कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा अर्थात् कदम्ब के पुष्प से सन्तुष्ट होती हैं,
३५ कदम्ब-पुष्प-मालिनी अर्थात् जो कदम्ब के फूलों की माला पहिने हैं । ३६ किशोरी, ३७ कल-कण्ठा अर्थात्
जिनका कण्ठ-स्वर बड़ा मधुर है, ३८ कल-नाद-निनादिनी अर्थात् कोयल के समान सुन्दर स्वरवाली, ३६ काद-
म्बरी-पान-रता अर्थात् मद्य-पान करती हैं, ४० कादम्बरी-प्रिया । ४१ कपाल-पात्र-निरता अर्थात् जिनका पान-
पात्र नर-कपाल है, ४२ कङ्काल-माल्य-धारिणी अर्थात् जो अस्थि-माला पहिने हैं । ४३ कमलासन-सन्तुष्टा अर्थात्
ब्रह्मा से सन्तुष्ट, ४४ कमलासन-वासिनी अर्थात् पद्मासीना । ४५ कमलालया-मध्यस्था, ४६ कमलामोद-मोदिनी
अर्थात् कमल की सुगन्ध से जो आनन्दित होती हैं । ४७ कल-हंस-गति अर्थात् राज-हंस के समान सुन्दर चालवाली,
४८ क्लैव्य-नाशिनी अर्थात् भक्तों के दुःख को दूर करनेवाली, ४६ काम-रूपिणी, ५० काम-रूप-कृतावासा अर्थात्
कामरूप-प्रदेश में जिनका निवास है, ५१ काम-पीठ-विलासिनी, ५२ कमनीया, ५३ कल्प-लता अर्थात् जो कल्प-
लता के समान साधकों के अभीष्ट को पूर्ण करती है, ५४ कमनीय-विभूषणा । ५५ कमनीय-गुणाराध्या अर्थात्
सुन्दर गुणों से जिनकी आराधना हो सकती है। ५६ कोमलाङ्गी, ५७ कृशोदरी, ५८ कारणामृत-सन्तोषा अर्थात्
मद्य-रूप अमृत से जो सन्तुष्ट होती हैं । ५६ कारणानन्द-सिद्धिदा अर्थात् कारण के पान से जो आनन्दित होती