महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ३७
इस प्रकार देवी का आवाहन कर प्राण-प्रतिष्ठा करे (६८-७०) । यथा-
आं ह्रीं क्रों श्रीं स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः प्राणा इह प्राणाः, आं ह्रीं क्रों श्रीं
स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः जीव इह स्थितः, आं ह्रीं क्रों श्रीं स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः
सर्वेन्द्रियाणि, आं ह्रीं क्रों स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः वाङ्-मनो-नयन-घ्राण-श्रोत्र-त्वक्-
प्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।
अर्थात् आद्या काली के प्राण इस स्थान में प्राण, आद्या काली की जीवात्मा इस स्थान में रहे, आद्या
काली की सभी इन्द्रियाँ, आद्या काली के वाक्य, मन, चक्षु, नासा, कर्ण, त्वक् और प्राण यहाँ आकर बहु काल
तक सुख से रहें (७१-७४) ।
इस प्रकार प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र का तीन बार पाठ कर लेलिहान-मुद्रा से यन्त्र के मध्य में देवी को प्राण-
प्रतिष्ठा कर हाथ जोड़कर निम्न मन्त्रों से उनका स्वागतादि करे (७५)—
आद्ये कालि ! स्वागतं ते सुस्वागतमिदं तव । आसनं चेदमत त्वयाऽऽस्यतां परमेश्वरि !
अर्थात् हे आद्ये कालि ! तुम्हारा स्वागत है, यह तुम्हारा सुस्वागत है। यह तुम्हारा आसन है। हे
परमेश्वरि ! तुम यहाँ विराजो (७६) ।
फिर देवता-शुद्धि के निमित्त तीन बार मूल-मन्त्र का उच्चारण कर विशेषार्घ्य-जल से देवी को प्रोक्षित
करे । तब षडङ्ग-मन्त्र से सकलीकरण करे । देवता के अङ्गों में षडङ्ग-न्यास करना ही सकलीकरण है। इसके
बाद षोडश उपचारों से देवी की पूजा करे (७७) ।
१. पाद्य, २. अर्घ्य, ३. आचमनीय, ४. स्नान, ५. वसन, ६. भूषण, ७. गन्ध, ८. पुष्प, ६. धूप, १०. दीप,
११. नैवेद्य, १२. पुनः आचमनीय, १३. अमृत, १४. ताम्बूल, १५. तर्पण, १६. नमस्कार-देवी-पूजा के समय
यही षोडश उपचार प्रयोग करे (७८-७६) ।
आद्या-बीज-'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा'-'इदं पाद्यं आद्यायै काल्यै नमः।' इस मन्त्र से दोनों
चरणों में पाद्य प्रदान करे । फिर इसी प्रकार ('नमः' पद में परिवर्तन करते हुए) अन्त में 'स्वाहा' लगाकर
मस्तक पर अर्घ्य निवेदित करे । ज्ञानी साधक इसी प्रकार अन्त में 'स्वधा' लगाकर मुख में आचमनीय और
उक्त मन्त्र से देवी के मुख-कमल में मधुपर्क प्रदान करे । इसी मन्त्र के अन्त में ('स्वधा' के स्थान पर) 'निवेदयामि'
लगाकर देवी के सर्वाङ्ग में स्नानीय, वस्त्र, भूषण-ये सब प्रदान करे (८०-८२) ।
सर्व-प्रथम मन्त्र के समान अन्त में 'नमः' जोड़कर मध्यमा-अनामिका से देवी के हृदय-कमल में गन्ध
लगावे । फिर 'नमः' के स्थान में 'वौषट्' लगाकर पुष्प प्रदान करे (८३) ।
तब धूप, दीप को सामने स्थापित कर प्रोक्षणादि से उन्हें संशोधित कर मन्त्र के अन्त में ('वौषट्' के
स्थान में) 'निवेदयामि' लगाकर उन्हें देकर ज्ञानी व्यक्ति निम्न मन्त्र से घण्टा की पूजा करे-
जय-ध्वनि-मन्त्र-मातः स्वाहा ।
फिर बाँएँ हाथ से घण्टा बजाते हुए दाएँ हाथ से धूप लेकर देवी की नासिका के निकट रखकर दीपक
को देवी के सम्मुख नेत्रों तक दस बार घुमावे (८४-८६) ।