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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 139 में से

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३२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
अर्थात् ईकार पाठ करे, बाद में 'सुधा-देव्यै वौषट्' इन दो पदों का प्रयोग करे । (इस प्रकार पूरा मन्त्र हुआ—
सहक्षमलवरयीं आनन्द-भैरव्यै वौषट्) । उसी कलश में आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की सम-रसता का
ध्यान कर उनके अमृत द्वारा उसे संसिक्त भावना कर उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (२०२-३) ।
तत्र देवता-बुद्धि से उस मद्य के ऊपर मूल-मन्त्र का पाठ करते हुए तीन बार पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । फिर
घण्टा-ध्वनि के साथ उसे धूप-दीप दिखाये (२०४) ।
देव-पूजा, व्रत, होम, विवाह और अन्य उत्सवों में इसी प्रकार सुरा का संस्कार करे (२०५) ।
सम्मुख स्थित त्रिकोण-मण्डल के ऊपर मांस-पात्र को लाकर 'फट्' से अभ्युक्षित कर वायु-बीज (यं) और
वह्नि-बीज (रं) द्वारा उसे तीन बार अभिमन्त्रित करे (२०६) । फिर कवच अर्थात् 'हूं' का पाठ करते हुए अव-
गुण्ठन-मुद्रा से उसे अवगुण्ठित कर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' से उसकी रक्षा करे । तब 'वं' मन्त्र पढ़कर धेनु-मुद्रा से
उसे अमृतीकृत कर निम्न मन्त्र पढ़े (२०७)—
विष्णोर्वक्षसि या देवी या देवी शङ्करस्य च । मांसं मे पवित्री-कुरु कुरु तद्-विष्णोः परमं पदम् ॥
अर्थात् जो देवी विष्णु के वक्षःस्थल पर और जो देवी शङ्कर के वक्षःस्थल पर विराजती हैं, वह मेरे इस
मांस को पवित्र करे; वह मेरे सम्बन्ध में विष्णु का प्रधान पद निश्चित करे ।
यह मांस-शोधन-विधि है (२०८) । इसी प्रकार कुल-धर्मज्ञ व्यक्ति मत्स्य-पात्र को लाकर उक्त मांस-शोधन-
मन्त्रों से उसे शोधित कर निम्न मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे (२०६)—
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
अर्थात् जैसे सूर्य को देखते हैं, वैसे ही विष्णु का परम पद सदा दिखाई देता है। जो अपने मन को वश
में रखता है और जागता रहता है, वह विष्णु के परम पद का दर्शन करता है ।
हे प्रिये ! इसके बाद मुद्रा-पात्र को लाकर उसी प्रकार शोधित कर निम्न मन्त्रों से अभिमन्त्रित करे—
ॐ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः, दिवीव चक्षुराततम् ।
ॐ तद् विप्रासो विपण्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् ।
अर्थात् उस त्र्यम्बक (शिव) की हम पूजा करते हैं, जो पुष्टि-कारक और सुगन्धिवाला है । उर्वारुक
का फल जैसे अपने आप गिर जाता है, उसी प्रकार हम बन्धनों से छूट जायें और अन्त में मुक्त होकर परमात्मा
में लय हो जायें ।
अथवा मूल-मन्त्र द्वारा ही पञ्च-तत्त्वों का शोधन करे । जिसे मूल-मन्त्र पर श्रद्धा है, उसे शाखा-पल्लव
से क्या प्रयोजन (२१२) ? केवल मूल-मन्त्र से जो द्रव्य शोधित होता है, वही देवता की प्रीति के लिए सबसे
अधिक प्रशस्त है, यह मैं कहता हूँ (२१३) । जिस समय साधक को अवसर न हो, तब सभी द्रव्यों को मूल-मन्त्र
से ही शोधित कर महा-देवी को निवेदित करे (२१४) । मूल-मन्त्र से शोधित सभी तत्त्वों को देवी को निवेदन
करने से कोई दोष नहीं होगा, किसी अङ्ग के कम होने का दोष नहीं होगा । यह सत्य है, सत्य है, पुनः कहता
हूँ कि यह सत्य है, यह शङ्कर का शासन है (२१५) ।
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