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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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२६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
नाभि में रक्त-वर्ण 'रं' बीज का ध्यान करते हुए कुम्भक (सांस रोक) कर ६४ बार इस बीज का जप करते हुए
उससे उत्पन्न अग्नि द्वारा पाप-परायण अपनी देह को जला डाले (१०१)। ललाट में शुक्ल-वर्ण वारुण बीज 'वं'
का ध्यान कर खींची हुई और फिर कुम्भित निःश्वास वायु को छोड़ते हुए इस बीज का ३२ बार जप करते हुए
इससे उत्पन्न अमृत-जल द्वारा जले हुए शरीर को प्लावित कर दे (१०२)। इस प्रकार पैर से मस्तक तक पूर्ण
रूप से करने के बाद देव-मय नवीन शरीर उत्पन्न हुआ है, ऐसी भावना करे (१०३)। फिर मूलाधार चक्र में
पीत-वर्ण पृथिवी-बीज 'लं' का ध्यान करते हुए इस बीज के उच्चारण और एकटक दर्शन से शीघ्र उत्पन्न अपने
शरीर को दृढ़ करे (१०४)। अपने वक्ष (छाती) पर हाथ रखकर 'आं ह्रीं क्रों हंसः' का उच्चारण कर 'सोहं'
कहे और इस मन्त्र द्वारा उस नव-जात देव-मय देह में देवी की प्राण-प्रतिष्ठा करे (१०५)।
हे अम्बिके ! इस प्रकार भूत-शुद्धि का विधान कर 'मैं देवी-स्वरूप हूँ' यह सोचते हुए एकाग्र-चित्त से
मातृका-न्यास करे (१०६)। यथा —
विनियोग—अस्य मातृका-न्यासस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । मातृका सरस्वती देवी देवता । व्यञ्जनाः।
बीजाः । स्वराः शक्तयः । सर्गः कीलकं । लिपि-न्यासे विनियोगः ।
अर्थात् इस मातृका-न्यास के ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द, मातृका सरस्वती देवी देवता, व्यञ्जन-वर्ण बीज,
स्वर-वर्ण शक्तियाँ, विसर्ग कीलक और लिपि के न्यास में विनियोग है।
इसी रूप में ऋषि-न्यास कर कर-न्यास और हृदयादि अङ्ग-न्यास करे (१०७-१०८) ।
(१) 'अं आं' इन दो वर्णों के मध्य में कवर्ग (ककारादि पञ्च-वर्णं) अर्थात् 'अं' के बाद 'कं खं गं घं ङं'
फिर 'आं' (इसी प्रकार अन्यत्र भी समझे) ;
(२) 'इं ईं' इन दो वर्णों के मध्य में चकारादि पञ्च-वर्णं ;
(३) 'उं ऊं' इन दो वर्णों के मध्य में टकारादि पञ्च-वर्णं ;
(४) 'एं ऐं' इनके मध्य में तकारादि पञ्च-वर्ण ;
(५) 'ओं औं' इन दो वर्णों के मध्य में पकारादि पञ्च-वर्ण ;
(६) अनुस्वार 'अं' और विसर्ग 'अः' इनके मध्य में 'य' से 'क्ष' तक के वर्ण—ये कर-न्यास और अङ्ग-
न्यास में मन्त्र-रूप बताए गए हैं (१०६-११०) । न्यास-विधि के अनुसार (अर्थात् पूर्वोक्त एक-एक श्रेणी मन्त्र का
उच्चारण कर उसके बाद यथा-क्रम) '१ अंगुष्ठाभ्यां नमः, २ तर्जनीभ्यां स्वाहा, ३ मध्यमाभ्यां वषट्, ४
अनामिकाभ्यां हुं, ५ कनिष्ठाभ्यां वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्' का उच्चारण करे—यह कर-
न्यास की विधि है और इसी प्रकार उक्त मन्त्रों का क्रमशः उच्चारण करते हुए यथा-क्रम '१ हृदयाय नमः, २
शिरसे स्वाहा, ३ शिखायै वषट्, ४ कवचाय हुं, ५ नेत्र-त्रयाय वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्'
का उच्चारण करना अङ्ग-न्यास की विधि है। इस प्रकार न्यास कर मातृका-सरस्वती का ध्यान करे (१११)—
पञ्चाशल्लिपिभिर्विभक्त-मुख-दोः-पन्मध्य-वक्षःस्थलाम्
भास्वन्मौलि-निबद्ध-चन्द्र-शकलामापीन-तुङ्ग-स्तनोम् ।
मुद्रामक्ष-गुणं सुधाढ्य-कलशं विद्यां च हस्ताम्बुजै-
र्बिभ्राणां विशद-प्रभां त्रिनयनां वाग्-देवतामाश्रये ॥