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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 139 में से

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पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २१
हे शिवे ! यह दश अक्षर वाला (ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) मन्त्र कहा गया। सर्व-विद्या-स्वरूपा,
उक्त मन्त्रात्मिका देवी परमेश्वरी विद्या है (१३) । श्रेष्ठ साधक 'सर्वाभीष्ट-सिद्धि' के लिए आद्य तीन बीजों में
से एक-एक बीज का अथवा तोनों बीजों का जप करते हैं (१४) ।
पहले तीन बीजों (ह्रीं श्रीं क्रीं) को छोड़ने से उक्त दशाक्षर मन्त्र 'परमेश्वरि स्वाहा'- सात अक्षर वाले
इस मन्त्र में बदल जाता है।
सप्ताक्षर मन्त्र के पहले काम-बीज (क्लीं), वाग्-बीज (ऐं) और तार (ॐ) के जोड़ने से तीन प्रकार के
अष्टाक्षर मन्त्र बनते हैं। यथा— १ क्लीं परमेश्वरि स्वाहा, २ ऐं परमेश्वरि स्वाहा और ३ ॐ परमेश्वरि
स्वाहा (१५) ।
पूर्वोक्त दशाक्षर-मन्त्र के सम्बोधन-पद के अन्त में 'कालिके' इस पद का उच्चारण करे । उसके बाद
आदि के बीज-त्रय (ह्रीं श्रीं क्रीं, का उच्चारण कर वह्नि-वधू (स्वाहा) पद कहे (१६) । इस प्रकार 'ह्रीं श्रीं क्रीं
परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा' यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र 'षोडशी' नाम से प्रख्यात होकर सभी तन्त्रों
में गुप्त है।
उक्त 'षोडशी' मन्त्र के आदि में वधू (स्त्रीं) अथवा प्रणव (ॐ) का योग करने से दो सप्त-दशाक्षर मन्त्र
होते हैं। यथा—१ स्त्रीं ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा, २ ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि
कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा (१७) ।
हे प्रिये ! तुम्हारे कोटि-कोटि अर्बुद मन्त्र हैं अतएव असंख्य मन्त्र हैं। यहाँ संक्षेप में बारह मन्त्र कहे हैं
(१८) । जिस-जिस तन्त्र में जो-जो मन्त्र कहे हैं, वे सभी तुम्हारे मन्त्र हैं क्योंकि तुम्हीं आद्या प्रकृति हो (१६) ।
इन सभी मन्त्रों के साधन का प्रकार एक हो है, मैं जगत् के हित और तुम्हारी प्रसन्नता के लिए उस साधन को
बताता हूँ (२०) । हे देवि ! कुलाचार के बिना शक्ति-मन्त्र सिद्धि-प्रद नहीं होता। अतएव कुलाचार में तत्पर
होकर शाक्त-साधन करना चाहिए (२१) । हे आद्ये ! शक्ति-पूजा के विधान में मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और
मैथुन—ये पञ्च-तत्त्व कहे हैं (२२) । पञ्च-तत्त्व से रहित पूजा करने से वह अभिचार का कारण अर्थात् प्राण-
घातक हो उठती है। उससे साधक को इष्ट-सिद्धि होती नहीं और पग-पग पर विघ्न होता है (२३) । पत्थर
के ऊपर अन्न बोने से जिस प्रकार अंकुर नहीं निकलता, उसी प्रकार पञ्च-तत्त्व-विहीन पूजा से फल नहीं
मिलता (२४) । हे देवि ! प्रातः-कृत्य न करने से कर्म में अधिकार नहीं होता, अतः सबसे पहले यथोचित प्रातः-
कृत्य बताता हूँ (२५) ।
रात्रि के अन्तिम प्रहर के शेषार्द्ध को 'अरुणोदय' काल कहते हैं। उसी समय निद्रा छोड़कर साधक उठ
जाय और अपने मस्तक में श्वेत कमल में बैठे हुए दो हाथ वाले, द्वि-नेत्र गुरुदेव का ध्यान करे (२६,—
ध्याये शिरसि शुक्लाब्जे द्वि-नेत्रं द्वि-भुजं गुरुं । श्वेताम्बर परीधानं श्वेत-माल्यानुलेपनम् ।।
वराभय-करं शान्तं करुणामय-विग्रहं । वामेनोत्पल-धारिण्या शक्त्यालिङ्गित-विग्रहम् ।।
श्वेताननं सुप्रसन्नं साधकाभीष्ट-दायकम् ।।
वे श्वेत वस्त्र पहने हैं, श्वेत माला से युक्त हैं, श्वेत चन्दन लगाए हैं और एक हाथ से वर तथा एक
हाथ से अभय दे रहे हैं। वे शान्त और करुणामय शरीरवाले हैं अर्थात् उनके शरीर को देखने से ही प्रतीत
होता है कि वे दयालु हैं (२७) । उनके बाईं ओर उनकी शक्ति कमल लिए हैं और उनके शरीर का आलिङ्गन
किए हैं (२८) । उनका मुख कुछ हँसो से युक्त है, वे अति प्रसन्न हैं और साधु जनों को अभीष्ट वर प्रदान करते