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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 139 में से

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पृष्ठ 26

चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १७
किसी वस्तु-विशेष में उसका अवस्थान नहीं है। वह निष्क्रिय है। वह सत्य-स्वरूप है। वह आदि-अन्त से रहित
है। वह वाणी और मन से अगोचर है (२८) ।
तुम परात्परा महा-योगिनी हो। तुम उस (ब्रह्म) की इच्छा मात्र का अवलम्बन कर इस चराचर जगत्
की सृष्टि करती हो ओर इस जगत् का पालन करती हो तथा सर्वान्त में सारे जगत् का संहार करती हो (२६) ।
जगत् का संहारक महा-काल है, यह तुम्हारा ही एक रूप है। यही महा-काल महा-संहार के समय सब
का ग्रास करता है (३०) । सब प्राणियों का 'कलन' अर्थात् ग्रास करता है, इसी से वह 'महा-काल' नाम से कहा
जाता है। तुम महा-काल का कलन अर्थात् ग्रास करती हो, इसी से तुम्हारा नाम है आद्या परमा कालिका (३१) ।
तुम काल को ग्रास करती हो, इसी से तुम 'काली' हो। तुम सबकी आदि हो। तुम सबकी काल-स्वरूपा और
आदि-भूता हो। इसी से तुमको संसार में 'आद्या काली' कहते हैं (३२) । सर्व-संहार-समय प्रलय-काल में तुम
वाणी के अतीत, मन से अगम्य, तमोमय आकृति-रहित स्वरूप का अवलम्बन कर अकेली स्थित रहती हो (३३) ।
तुम साकारा होकर भी निराकारा हो। तुम माया द्वारा बहुत से रूप धारण करती हो, तुम सबको आदि हो,
अनादि हो, कर्त्री, हर्त्री और पालिका हो (३४) । इसलिए हे भद्रे ! मैं तुमसे कहता हूँ कि ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित
व्यक्ति जो फल प्राप्त करता है, वह तुम्हारे साधन द्वारा भी उसी फल को पा सकता है (३५) ।
हे देवि ! देश, काल और अधिकार-भेद से विविध आचारों और भावों को प्रकट करता हूँ। किसी-किसी
तन्त्र में मैंने गुप्त साधन भी कहे हैं (३६) । उनमें से जिस साधन में जो मनुष्य अधिकारी है, वह उसके अनुरूप
अनुष्ठान कर फल को प्राप्त करता है और पाप-रहित होकर भव-सागर को पार करता है (३७) ।
बहुत से जन्मों में अर्जित पुण्य के द्वारा जीव की प्रवृत्ति कुलाचार में होती है। कुलाचार द्वारा जिसकी
आत्मा पवित्र होती है, वह साक्षात् शिव-मय होता है (३८) । जहाँ भोग का बाहुल्य है, वहाँ क्या योग की
सम्भावना है ? जहाँ योग का अनुष्ठान है, वहाँ भोग की भी सम्भावना दिखाई नहीं देती। कुलाचार में प्रवृत्त
जीव भोग और योग—इन दोनों का भोग करता है (३६) । हे सुव्रते ! जिस व्यक्ति द्वारा कुल-तत्त्व-ज्ञानी एक
साधक की पूजा की जाती है, उसके द्वारा सभी देव एवं सभी देवियाँ पूजा पा जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं (४०) ।
सोने से भरी हुई पृथिवी का दान करने से जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना अधिक पुण्य कुलाचार-निरत
एक व्यक्ति की पूजा करने से प्राप्त होता है (४१) । यदि चाण्डाल भी कुल-तत्त्व-ज्ञानी है, तो वह ब्राह्मण की
भी अपेक्षा श्रेष्ठ है किन्तु यदि ब्राह्मण कुलाचार-हीन है, तो वह चाण्डाल से भी नीच है (४२) ।
मैं जानता हूँ कि कुल-धर्म की अपेक्षा कोई अन्य धर्म श्रेष्ठ नहीं है। यह जो कुल-धर्म है, इसके अनुष्ठान
मात्र से मनुष्य लोग ब्रह्म-ज्ञानी हो जाते हैं (४३) । हे देवि ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम हृदय में इसे धारण
कर लो। कुल-धर्म सब धर्मों की अपेक्षा उत्तम है, इससे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं है (४४) । यही परम पथ है,
पशु-समूह से गुप्त है। जब प्रबल कलिकाल होगा, तब शीघ्र ही यही पथ प्रकाशित हो उठेगा (४५) । मैं सत्य
सत्य कहता हूँ, जब कलिकाल प्रकृष्ट रूप में वर्द्धित होगा, तब कौलाचारी मनुष्यों के सिवा पश्वाचारी लोग
पृथिवी पर नहीं रहेंगे (४६) । हे वरारोहे ! जब देखना कि पृथिवी पर वैदिकी दीक्षा और पौराणिकी दीक्षा नहीं
हैं, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४७) । हे शान्ते शिवे ! जिस समय पाप-पुण्य की वेदोक्त परीक्षा नहीं रहेगी,
तभी विवेचन करना कि कलि प्रबल है (४८) । हे कुलेश्वरि ! जिस समय गंगा कहीं छिन्न और कहीं भिन्न रूप
में होंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४६) । हे महा-प्राज्ञे ! जिस समय म्लेच्छ जाति के लोग शासक होंगे
और वे धन-लोलुप होंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५०) । जिस समय स्त्रियाँ बहुत दुर्दान्त, कर्कश-
भाषिणी और कलह-तत्परा होकर स्वामी की निन्दा करेंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५१) । जिस समय
फा० ३