महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
५ बुद्ध-मन्त्र—ह्रीँ श्रीँ सौम्य सर्वान् कामान् पूरय स्वाहा
६ वृहस्पति-मन्त्र—ॐ ऐँ ॐ सुर-गुरो अभीष्टं यच्छ यच्छ स्वाहा
७ शुक्र-मन्त्र—शाँ शीँ शूं शैँ शौँ शः
८ शनि-मन्त्र—ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ ह्रैँ सर्व-शत्रून् विद्रावय विद्रःवय मार्तण्ड-सूनवे नमः
९ राहु-मन्त्र—राँ ह्राँ भ्रौं ह्रीँ सोम-शत्रो शत्रून् विध्वंसय विध्वंसय राहवे नमः
१० केतु-मन्त्र—हूँ ह्लूँ कैँ केतवे स्वाहा
११ दश-दिक्पाल-मन्त्र—१ लं इन्द्राय नमः, २ रं अग्नये नमः, ३ मृं यमाय नमः, ४ स्त्रूं निर्ऋतये
नमः, ५ वं वरुणाय नमः, ६ यं वायवे नमः, ७ क्षं कुबेराय नमः, ८ ह्रौं ईशानाय नमः, ६ ब्रीं ब्रह्मणे नमः,
१० अं अनन्ताय नमः। (१०३-१३)
अन्य परिवार-देवताओं के नाम ही उनके मन्त्र हैं। जहाँ मन्त्र नहीं बताया है, वहाँ नाम ही मन्त्र होता
है (११४)। जिस मन्त्र के अन्त में 'नमः' लगा है, उसमें 'नमः' न जोड़े। इसी प्रकार स्वाहान्त मन्त्र में 'स्वाहा'
शब्द न जोड़े (११५)।
नौ ग्रहों और दश दिक्पालों को उनके वर्ण के अनुरूप रङ्ग के पुष्प, वस्त्र व आभूषण दें अन्यथा वे
प्रसन्न नहीं होते (११६)।
ज्ञाना व्यक्ति कुशण्डिकोक्त विधि से वह्नि-स्थापन कर विविध पुष्पों व समिधा द्वारा होम करे (११७)।
शान्ति और पुष्टि-कर्मों में 'वरद' नामक अग्नि, प्रतिष्ठा-कर्म में 'लोहिताक्ष' नामक और क्रूर कर्मों अर्थात्
अभिचारादि म 'शत्रुहा' नामक अग्नि में होम करे (११८)।
हे महेशानि ! शान्ति, पुष्टि व क्रूर कर्मों में 'ग्रह-याग' करने से अभीष्ट फल मिलता है (११६)। प्रतिष्ठा-
कार्यों में जैसे देव-पूजा और पितृ-तर्पण अर्थात् आभ्युदयिक श्राद्ध कर्त्तव्य हैं वैसे ही वास्तु-याग और ग्रह-याग में
भी करे (१२०)। यदि एक ही दिन दो-तीन प्रतिष्ठा व वास्तु-यागादि करने हों, तो उन सब कार्यों के लिए एक
बार देव-पूजन, पितृ-श्राद्ध और अग्नि-संस्कार करे (१२१)।
फल चाहनेवाले व्यक्ति जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम, वृक्ष, वाहन और अन्य दूसरी देय वस्तु को
'प्रोक्षण' किये बिना देवता को न दे (१२२-१२३)। सभी काम्य कर्मों में पूरा फल पाने के लिए विधि-वाक्य के
अनुसार 'सङ्कल्प' करे (१२४)। शोधित और अर्चित द्रव्य का नामोल्लेख कर 'सम्प्रदाय' अर्थात् जिसे दान
देना है, उसक नाम का उच्चारण कर दान करने से ठीक फल मिलता है (१२५)।
जलाशय, गृह, उपवन, सेतु, संक्रम और वृक्ष के 'प्रोक्षण-मन्त्र' कहते हैं। इन सभी मन्त्रों का प्रयोग
'ब्रह्म-विद्या' अर्थात् गायत्री के साथ करे (१२६)।
१ जलाशय-प्रोक्षण-मन्त्र—'जीवनाधार ! जीवानां जीवन-प्रद ! वरुण ! प्रोक्षणे तव तृ प्यन्तु जल-
चर-भूचर-खेचराः ।।' अर्थात् हे जलाधार ! हे प्राणियों के जोवन-दाता ! हे वरुण ! तुम्हारे प्रोक्षण से जल-चर,
भू-चर और खेचर सभी तृप्त हों (१२७)।
२ गृह-प्रोक्षण-मन्त्र—'तृण-काष्ठादि-सम्भूत वासेय ! ब्रह्मणः प्रिय ! त्वां प्रोक्षयामि तोयेन प्रीतये भव
सर्वदा ।।' अर्थात् हे तृण-काष्ठादि-सम्भूत रहने योग्य गृह ! हे ब्रह्मा के प्रिय ! तुम्हें जल से प्रोक्षित करता हूँ।
सदा मुझे प्रसन्न रखो (१२८)। ईंट का गृह हो तो 'इष्ठकादि-सम्भूत' कहे (१२६)।
३ उपवन-प्रोक्षण-मन्त्र—'फलैः पत्रैश्च शाखाभिश्छायाभिश्च प्रियङ्कराः । यच्छन्तु मेऽखिलान् कामान्
प्रोक्षितास्तीर्थ-वारिभिः ।' अर्थात् फल, पत्तों, डालियों और छायाओं द्वारा प्रसन्न करनेवाले हे उपवन ! तीर्थ-