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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 139 में से

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पृष्ठ 114

१०४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
देवी ने कहा—हे नाथ ! वास्तु-देव का मण्डल और वास्तु-पूजा की विधि आपने बताई किन्तु वास्तुदेव
का ध्यान आपने नहीं कहा। अब इसे प्रकट करें (६१)।
श्री सदाशिव ने कहा--हे महेश्वरि ! वास्तु-राक्षस का ध्यान कहता हूँ, सुनो, जिसका अनुशीलन करने से
सारी आपत्तियाँ तुरन्त नष्ट हो जाती हैं (६२)—
चतुर्भुजं महा-कायं जटा-मण्डित-मस्तकम् । त्रिलोचनं करालास्यं हार-कुण्डल-शोभितम् ॥
लम्बोदरं दीर्घ-कर्णं लोमशं पीत-वाससम् । गदा-त्रिशूल-परशु-खट्वाङ्गं दधतं करैः ॥
असि-चर्म-धरैर्वीरैः कपिलास्यादिभिर्युतम् । शत्रूणामन्तकं साक्षादुद्यदादित्य-सन्निभम् ॥
ध्यायेद् देवं वास्तु-पतिं कूर्म-पद्मासन-स्थितम् ।
अर्थात् चतुर्भुज, विशाल-काय, जटा-जूट से विभूषित मस्तक, त्रिनेत्र, भयानक मुख, हार और कुण्डल
से विभूषित, लम्बोदर, दीर्घ-कर्ण, लोमश, पीत-वस्त्र, चार हाथों में गदा, त्रिशूल, परशु और खट्वाङ्ग,
खड्ग-चर्म-धारी, कपिलास्य आदि वीर-गणों से वेष्ठित, शत्रु-संहार-कारी, साक्षात् उदय होते हुए सूर्य के
समान तेजस्वी, कूर्म के ऊपर पद्मासन पर बैठे हुए 'वास्तु-पति देव' का ध्यान करना चाहिए।
महामारी, रोग, डाकिनी-भय, उपद्रव, सन्तान के दोष, सर्प या राक्षस-भय के होने पर उक्त प्रकार का
ध्यान कर सपरिवार 'वास्तु-देव' को पूजा करे (६३-६७)। फिर तिल, घृत और पायस से होम करे, तो सभी
बातों में शान्ति मिलती है।
हे सुव्रते ! पूर्वोक्त कर्मों में जिस प्रकार 'वास्तु-पुरुष' पूज्य हैं, उसी प्रकार 'नव-ग्रह', 'दश-दिक्पाल'
और 'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वाग्-देवी, लक्ष्मी, शङ्करी, मातृ-गण, गणेश' व 'वसु-गण' भी पूजनीय हैं। हे
कालिके ! उक्त सभी कर्मों में यदि 'पितृ-गण' तृप्त नहीं हैं, तो कर्त्ता का सभी कुछ व्यर्थ जाता है और उसके
पग-पग पर विघ्न आते हैं, अतः हे महेश्वरि ! यत्न करके उक्त संस्कार-कर्मों में और इसमें 'पितृ-गण' की तृप्ति
के लिए 'आभ्युदयिक श्राद्ध' करें।
अब सर्व-शान्ति-विधायक 'ग्रह-यन्त्र' बताता हूँ (६८-७२), जिसमें 'ग्रह-गण' और 'इन्द्रादि दिक्-पाल-
गण' पूजित होकर वांञ्छित वर देते हैं (७३)। तीन त्रिकोण बनाकर उनके बाहर एक वृत्त बनाए। उस वृत्त के
बाहर उससे लगे हुए आठ दल (पंखड़ियाँ) बनाए। उनके बाहर चार द्वारों सहित एक सुन्दर भूपुर बनाए
(७४)। भूपुर के बाहर पूर्व और ईशान कोण के मध्य में प्रादेश बराबर एक वृत्त बनाए (७५)। फिर पश्चिम
और नैर्ऋत कोण के मध्य में भी ऐसा ही एक और वृत्त बनाए (७६)। तब नव-ग्रह के रङ्गों द्वारा इस यन्त्र के
नौ कोणों को भरे (७७)। मध्य त्रिकोण को दाईं और बाईं ओर क्रमशः श्वेत और पीत रंग भरे। उसका
पीछे का भाग काला रंगे। अष्ट-दलों का अष्ट-दिक्-पाल के रङ्गों से भरे (७८)। श्वेत, रक्त और कृष्ण रंग के
चूर्ण से भूपुर की प्राचीर रंगे। हे देवि ! भूपुर के बाहर स्थित प्रादेश-बराबर दोनों वृत्तों के ऊपर और बीच के
भागों को क्रमशः रक्त और श्वेत रङ्ग का बनाए। सारे सन्धि-स्थानों को स्वेच्छानुसार रंग से भरे (७६-८०)।
जिस प्रकोष्ठ में जिस ग्रह का और जिस दल में जिस दिक्-पाल की पूजा करनी है तथा जिस द्वार में
जिस देवता की स्थिति है, उनका क्रम अब बताता हूँ, सुनो (८१) - मध्य कोण में 'सूर्य' की पूजा करे, उनके
दोनों ओर 'अरुण' और 'शिखा' की पूजा करे। सूर्य के पीछे के भाग में 'प्रचण्ड' और 'उद्दण्ड' की पूजा करे
(८२)। सूर्य के ऊर्ध्व-कोण में पूर्व-दिशा में 'चन्द्र' का, अग्नि-कोण में 'मङ्गल' की, दक्षिण दिशा में 'बुध' की,
नैर्ऋत-कोण में 'बृहस्पति' को, पश्चिम दिशा में 'शुक्र' की, वायु-कोण में 'शनि' की, उत्तर-दिशा में 'राहु' को,