महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2036, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहत्तत्त्व आदि गुणोंकी उत्पत्ति प्रकृति और पुरुषके परस्पर संयोगसे होती है; अतः एक-दूसरेका अधिष्ठान होनेके कारण पुरुषको भी क्षेत्र कहते हैं ।। १४ ।।
यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि संक्षिपेत् ।
तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीयते ।। १५ ।।
योगी जब अपने योगके प्रभावसे प्रकृतिके गुण-समूहको अव्यक्त मूल प्रकृतिमें विलीन कर देता है, तब उन गुणोंका विलय होनेके साथ-साथ पचीसवाँ तत्त्व पुरुष भी परमात्मामें मिल जाता है। इस दृष्टिसे उसे भी क्षर कह सकते हैं ।। १५ ।।
गुणा गुणेषु लीयन्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत् ।
क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे सम्प्रलीयते ।। १६ ।।
तात! जब कार्यभूत गुण कारणभूत गुणोंमें लीन हो जाते हैं, उस समय सब कुछ एकमात्र प्रकृतिस्वरूप हो जाता है तथा जब क्षेत्रज्ञ भी परमात्मामें लीन हो जाता है, तब उसका भी पृथक् अस्तित्व नहीं रहता ।। १६ ।।
तदा क्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसंश्रिता ।
निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेष्वप्रतिवर्तनात् ।। १७ ।।
विदेहराज! उस समय त्रिगुणमयी प्रकृति क्षरत्व (नाश) को प्राप्त होती है और पुरुष भी गुणोंमें प्रवृत्त न होनेके कारण निर्गुण (गुणातीत) हो जाता है ।। १७ ।।
एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षये ।
प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ।। १८ ।।
इस प्रकार जब क्षेत्रका ज्ञान नहीं रहता अर्थात् पुरुषको प्रकृतिका ज्ञान नहीं रहता, तब वह स्वभावसे ही निर्गुण है—यह हमने सुन रखा है ।। १८ ।।
क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ ।
प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथाऽऽत्मनः ।। १९ ।।
जब यह पुरुष क्षर होता है, अर्थात् परमात्मामें लीन हो जाता है, उस समय वह प्रकृतिके सगुणत्वको और अपने निर्गुणत्वको यथार्थ समझ लेता है ।। १९ ।।
तदा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् ।
अन्योऽहमन्येयमिति यदा बुध्यति बुद्धिमान् ।। २० ।।
इस तरह ज्ञानवान् पुरुष जब यह जान लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्रकृति मुझसे भिन्न है, तब वह प्रकृतिसे रहित हो जानेसे अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित होता है ।। २० ।।
तदैष तत्त्वतामेति न चापि मिश्रतां व्रजेत् ।
प्रकृत्या चैव राजेन्द्र मिश्रौ ह्यन्यश्च दृश्यते ।। २१ ।।
राजेन्द्र! प्रकृतिसे संयोगके समय उससे अभिन्न-सा प्रतीत होनेके कारण यह पुरुष तद्रूपताको प्राप्त हुआ-सा जान पड़ता है, परंतु उस अवस्थामें भी उसका प्रकृतिके साथ