महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2035, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्या प्रकृतिरव्यक्तं तत्त्वानां परमेश्वरी ।
विद्या ज्ञेया नरश्रेष्ठ विधिश्च परमः स्मृतः ॥ ७ ॥
नरश्रेष्ठ! अव्यक्त नामवाली जो परमेश्वरी प्रकृति है, वह सम्पूर्ण तत्त्वोंकी विद्या है। यह विद्या जानने योग्य है। इसीको ज्ञानकी परम विधि कहते हैं ॥ ७ ॥
अव्यक्तस्य परं प्राहुर्विद्यां वै पञ्चविंशकम् ।
सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेयं ज्ञानस्य पार्थिव ॥ ८ ॥
पचीसवें तत्त्वके रूपमें जिस परम पुरुष परमात्माकी चर्चा की गयी है, उसीको अव्यक्त प्रकृतिकी परम विद्या बताया गया है। राजन्! वही सम्पूर्ण ज्ञानका सर्वरूप ज्ञेय है ॥ ८ ॥
ज्ञानमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञेयो वै पञ्चविंशकः ।
तथैव ज्ञानमव्यक्तं विज्ञाता पञ्चविंशकः ॥ ९ ॥
ज्ञान अव्यक्त कहा गया है और परम पुरुष ज्ञेय बताया गया है, उसी प्रकार ज्ञान अव्यक्त है और उसका ज्ञाता परम पुरुष है ॥ ९ ॥
विद्याविद्यार्थतत्त्वेन मयोक्ता ते विशेषतः ।
अक्षरं च क्षरं चैव यदुक्तं तन्निबोध मे ॥ १० ॥
राजन्! मैंने तुम्हारे समक्ष यथार्थरूपसे विद्यासहित अविद्याका विशेषरूपसे वर्णन किया है। अब जो क्षर और अक्षर तत्त्व कहे गये हैं; उनके विषयमें मुझसे सुनो ॥
उभावेवाक्षरावुक्तावुभावेतावनक्षरौ ।
कारणं तु प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं तु ज्ञानतः ॥ ११ ॥
सांख्यमतमें प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही अक्षर कहा गया है तथा ये ही दोनों क्षर भी हैं। मैं अपने ज्ञानके अनुसार इसका यथार्थ कारण बतलाता हूँ ॥ ११ ॥
अनादिनिधनावेतावुभावेवेश्वरौ मतौ ।
तत्त्वसंज्ञावुभावेतौ प्रोच्येत ज्ञानचिन्तकैः ॥ १२ ॥
ये दोनों ही अनादि और अनन्त हैं; अतः परस्पर संयुक्त होकर दोनों ही ईश्वर (सर्वसमर्थ) माने गये हैं। सांख्यज्ञानका विचार करनेवाले विद्वान् इन दोनोंको ही 'तत्त्व' कहते हैं ॥ १२ ॥
सर्गप्रलयधर्मत्वादव्यक्तं प्राहुरक्षरम् ।
तदेतद् गुणसर्गाय विकुर्वाणं पुनः पुनः ॥ १३ ॥
सृष्टि और प्रलय प्रकृतिका धर्म है। इसलिये प्रकृतिको अक्षर कहा गया है। वही प्रकृति महत्तत्त्व आदि गुणोंकी सृष्टिके लिये बारंबार विकारको प्राप्त होती है; इसलिये उसे क्षर भी कहा जाता है ॥ १३ ॥
गुणानां महदादीनामुत्पत्तिश्च परस्परम् ।
अधिष्ठानात् क्षेत्रमाहुरेतत्तत् पञ्चविंशकम् ॥ १४ ॥