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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1064

क्षत्रियस्य तु बालिश्याद् ब्राह्मणः क्लिश्यते क्षुधा ॥ १३ ॥
उस दशामें धर्मज्ञ राजा धर्मके अनुसार उसे दण्ड न दे; क्योंकि क्षत्रिय राजाकी नादानीसे ही ब्राह्मणको भूखका कष्ट उठाना पड़ता है ॥ १३ ॥

श्रुतशीले समाज्ञाय वृत्तिमस्य प्रकल्पयेत् ।
अथैनं परिरक्षेत् पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १४ ॥
राजा उसके शास्त्रज्ञान और स्वभावका परिचय प्राप्त करके उसके लिये उचित आजीविकाकी व्यवस्था करे और जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह उस ब्राह्मणकी रक्षा करे ॥ १४ ॥

इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये ।
अनुकल्पः परो धर्मो धर्मवादैस्तु केवलम् ॥ १५ ॥
प्रतिवर्ष किये जानेवाले आग्रयण आदि यज्ञ यदि न किये जा सके हों तो उनके बदले प्रतिदिन वैश्वानरी इष्टि समर्पित करे। मुख्य कर्मके स्थानमें जो गौण कार्य किया जाता है, उसका नाम अनुकल्प है, धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा बताया गया अनुकल्प भी परम धर्म ही है ॥ १५ ॥

विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
आपत्सु मरणाद् भीतैर्विधिः प्रतिनिधीकृतः ॥ १६ ॥
क्योंकि विश्वेदेव, साध्य, ब्राह्मण और महर्षि—इन सब लोगोंने मृत्युसे डरकर आपत्कालके विषयमें प्रत्येक विधिक प्रतिनिधि नियत कर दिया है ॥ १६ ॥

प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पे न वर्तते ।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ १७ ॥
जो मुख्य विधिके अनुसार कर्म करनेमें समर्थ होकर भी गौण विधिसे काम चलाता है, उस दुर्बुद्धि मनुष्यको पारलौकिक फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १७ ॥

न ब्राह्मणो निवेदेत किंचिद् राजनि वेदवित् ।
स्ववीर्याद् राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् ॥ १८ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके निकट अपनी आवश्यकता निवेदन न करे; क्योंकि ब्राह्मणकी अपनी शक्ति तथा राजाकी शक्तिमेंसे उसकी अपनी ही शक्ति प्रबल है ॥ १८ ॥

तस्माद् राज्ञः सदा तेजो दुःसहं ब्रह्मवादिनाम् ।
कर्ता शास्ता विधाता च ब्राह्मणो देव उच्यते ॥ १९ ॥
अतः ब्रह्मवादियोंका तेज राजाके लिये सदा दुःसह है। ब्राह्मण इस जगत्का कर्ता, शासक, धारण-पोषण करनेवाला और देवता कहलाता है ॥ १९ ॥

तस्मिन्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कामीरयेद् गिरम् ।
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ॥ २० ॥