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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1063, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1063

ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ६ ॥
यो वैश्यः स्याद् बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात् तस्य तद् वित्तं यज्ञार्थं पार्थिवो हरेत् ॥ ७ ॥
यदि धर्मात्मा राजाके रहते हुए किसी यज्ञकर्ताका, विशेषतः ब्राह्मणका यज्ञ धनके बिना अधूरा रह जाय—उसके एक अंशकी पूर्ति शेष रह जाय तो राजाको चाहिये कि उसके राज्यमें जो बहुत पशुओं तथा वैभवसे सम्पन्न वैश्य हो, यदि वह यज्ञ तथा सोमयागसे रहित हो तो उसके कुटुम्बसे उस धनको यज्ञके लिये ले ले ॥ ६-७ ॥

आहरेदथ नो किञ्चित् कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
न हि यज्ञेषु शूद्रस्य किञ्चिदस्ति परिग्रहः ॥ ८ ॥
किंतु राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रके घरसे थोड़ा-सा भी धन न ले आवे; क्योंकि यज्ञोंमें शूद्रका किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है ॥ ८ ॥

योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ ९ ॥
जिस वैश्यके पास एक सौ गौएँ हों और वह अग्निहोत्र न करता हो, तथा जिसके पास एक हजार गौएँ हों और वह यज्ञ न करता हो, उन दोनोंके कुटुम्बोंसे राजा बिना विचारे ही धन उठा लावे ॥ ९ ॥

अदातृभ्यो हरेद् वित्तं विख्याप्य नृपतिः सदा ।
तथैवाचरतो धर्मो नृपतेः स्यादथाखिलः ॥ १० ॥
जो धन रहते हुए उसका दान न करते हों, ऐसे लोगोंके इस दोषको विख्यात करके राजा सदा धर्मके लिये उनका धन ले ले, ऐसा आचरण करनेवाले राजाको सम्पूर्ण धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥

तथैव शृणु मे भक्तं भक्तानि षडनश्नतः ।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं अन्नके विषयमें जो बात बता रहा हूँ, उसे सुनो। यदि ब्राह्मण अन्नाभावके कारण लगातार छः समयतक उपवास कर जाय तो उस अवस्थामें वह किसी निकृष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यके घरसे उतने धनका अपहरण कर सकता है, जिससे उसके एक दिनका भोजन चल जाय और दूसरे दिनके लिये कुछ बाकी न रहे ॥ ११ ॥

खलात् क्षेत्रात् तथा रामाद् यतो वाप्युपपद्यते ।
आख्यातव्यं नृपस्यैतत् पृच्छतेऽपृच्छतेऽपि वा ॥ १२ ॥
खलिहानसे, खेतसे, बगीचेसे अथवा जहाँसे भी अन्न मिल सके, वहींसे वह भोजनमात्रके लिये अन्न उठा लावे और उसके बाद राजा पूछे या न पूछे उसके पास जाकर अपनी वह बात उसे कह दे ॥ १२ ॥

न तस्मै धारयेद् दण्डं राजा धर्मेण धर्मवित् ।