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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

सम्पूज्यमानः कुरुभिर्महात्मा
रथर्षभो देवगणैर्यथेन्द्रः।
ययौ तदायोधनमुग्रधन्वा
यत्रावसानं भरतर्षभस्य ॥ ३५ ॥

उस समय देवगणोंसे इन्द्रकी भाँति समस्त कौरवोंसे पूजित हो रथियोंमें श्रेष्ठ, भयंकर धनुर्धर, महामनस्वी कर्ण युद्धके उस मैदानमें गया, जहाँ भरतशिरोमणि भीष्मका देहावसान हुआ था ॥ ३५ ॥

वरूथिना महता सध्वजेन
सुवर्णमुक्तामणिरत्नमालिना।
सदश्वयुक्तेन रथेन कर्णो
मेघस्वनेनार्क इवामितौजाः ॥ ३६ ॥

सुवर्ण, मुक्ता, मणि तथा रत्नोंकी मालासे अलंकृत सुन्दर ध्वजासे सुशोभित, उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा अमित तेजस्वी कर्ण विशाल सेना साथ लिये युद्धभूमिकी ओर चल दिया ॥ ३६ ॥

हुताशनाभः स हुताशनप्रभे
शुभः शुभे वै स्वरथे धनुर्धरः।
स्थितो रराजाधिरथिर्महारथः
स्वयं विमाने सुरराडिवास्थितः ॥ ३७ ॥