सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

श्रीकृष्णद्वारा अर्जुनके अश्वोंकी परिचर्या

न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां
मध्ये शूराणां तत्र चाहं ब्रवीमि ।
मित्रद्रुहो दुर्बलभक्तयो ये
पापात्मानो न ममैते सहायाः ॥ ३३ ॥
‘अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि मैं उन शूरवीरोंके बीचमें न जाऊँ। इस विषयमें मैं इतना ही कहता हूँ कि जो मित्रद्रोही हों, जिनकी स्वामिभक्ति दुर्बल हो तथा जिनके मनमें पाप भरा हो; ऐसे लोग मेरे साथ न रहें’ ॥ ३३ ॥

संजय उवाच

समृद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं
सकूबरं हेमपरिष्कृतं शुभम् ।
पताकिनं वातजवैर्हयोत्तमै-
र्युक्तं समास्थाय ययौ जयाय ॥ ३४ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर कर्ण वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए, कूबर और पताकासे युक्त, सुवर्णभूषित, सुन्दर, समृद्धिशाली, सुदृढ़ तथा श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो युद्धमें विजय पानेके लिये चल दिया ॥ ३४ ॥