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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 447

राजा रन्तिदेवकी वह अलौकिक समृद्धि देखकर पुराणवेत्ता पुरुष वहाँ इस प्रकार उनकी यशोगाथा गाया करते थे ।। १२ ।।
नैतादृशं दृष्टपूर्वं कुबेरसद्नेष्वपि ।
धनं च पूर्यमाणं नः किं पुनर्मनुजेष्विति ।। १३ ।।
हमने कुबेरके भवनमें भी पहले कभी ऐसा (रन्तिदेवके समान) भरा-पूरा धनका भंडार नहीं देखा है; फिर मनुष्योंके यहाँ तो हो ही कैसे सकता है? ।।
व्यक्तं वस्वोकसारेयमित्यूचुस्तत्र विस्मिताः ।
वास्तवमें रन्तिदेवकी समृद्धिका सारतत्त्व उनका सुवर्णमय राजभवन और स्वर्णराशि ही है। इस प्रकार विस्मित होकर लोग उस गाथाका गान करने लगे ।। १३ १/२ ।।
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत् ।। १४ ।।
आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः ।
संकृतिपुत्र रन्तिदेवके यहाँ जिस रातमें अतिथियोंका समुदाय निवास करता था, उस समय वहाँ इक्कीस हजार गौएँ छूकर दान की जाती थीं ।। १४ १/२ ।।
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति
सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।। १५ ।।
सूपं भूयिष्ठमश्रीध्वं
नाद्य मांसं यथा पुरा ।
वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये रसोइये पुकार-पुकारकर कहते थे, आपलोग खूब दाल और कढ़ी खाइये। यह आज जैसी स्वादिष्ट बनी है, वैसी पहले एक महीनेतक नहीं बनी थी ।। १५ १/२ ।।
रन्तिदेवस्य यत् किंचित्
सौवर्णमभवत् तदा ।। १६ ।।
तत् सर्वं वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।
उन दिनों राजा रन्तिदेवके पास जो कुछ भी सुवर्णमयी सामग्री थी, वह सब उन्होंने उस विस्तृत यज्ञमें ब्राह्मणोंको बाँट दी ।। १६ १/२ ।।
प्रत्यक्षं तस्य हव्यानि प्रतिगृह्णन्ति देवताः ।। १७ ।।
कव्यानि पितरः काले सर्वकामान् द्विजोत्तमाः ।
उनके यज्ञमें देवता और पितर प्रत्यक्ष दर्शन देकर यथासमय हव्य और कव्य ग्रहण करते थे तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको पाते थे ।।
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। १८ ।।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। १९ ।।