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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 3237 में से

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजा सुहोत्रकी दानशीलता

नारद उवाच

सुहोत्रं नाम राजानं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
एकवीरमशक्यं तममरैरभिवीक्षितुम् ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— 'संजय! राजा सुहोत्रकी भी मृत्यु सुनी गयी है। वे अपने समयके अद्वितीय वीर थे। देवता भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकते थे ॥ १ ॥
यः प्राप्य राज्यं धर्मेण ऋत्विग्ब्रह्मपुरोहितान् ।
अपृच्छदात्मनः श्रेयः पृष्ट्वा तेषां मते स्थितः ॥ २ ॥
उन्होंने धर्मके अनुसार राज्य पाकर ऋत्विजों, ब्राह्मणों तथा पुरोहितोंसे अपने कल्याणका उपाय पूछा और पूछकर वे उनकी सम्मतिके अनुसार चलते रहे ॥ २ ॥
प्रजानां पालनं धर्मो दानमिज्या द्विषज्जयः ।
एतत् सुहोत्रो विज्ञाय धर्मेणैच्छद् धनागमम् ॥ ३ ॥
प्रजापालन, धर्म, दान, यज्ञ और शत्रुओंपर विजय पाना—इन सबको राजा सुहोत्रने अपने लिये श्रेयस्कर जानकर धर्मके द्वारा ही धन पानेकी अभिलाषा की ॥ ३ ॥
धर्मेणाराधयन् देवान्
बाणैः शत्रूञ्जयंस्तथा ।
सर्वाण्यपि च भूतानि
स्वगुणैरप्यरञ्जयत् ॥ ४ ॥
यो भुक्त्वेमां वसुमतीं
म्लेच्छाटविकवर्जिताम् ।
यस्मै ववर्ष पर्जन्यो
हिरण्यं परिवत्सरान् ॥ ५ ॥
उन्होंने इस पृथ्वीको म्लेच्छों तथा तस्करोंसे रहित करके इसका उपभोग किया और धर्माचरणद्वारा देवताओंकी आराधना तथा बाणोंद्वारा शत्रुओंपर विजय करते हुए अपने गुणोंसे समस्त प्राणियोंका मनोरंजन किया था, उनके लिये मेघने अनेक वर्षोंतक सुवर्णकी वर्षा की थी ॥ ४-५ ॥
हैरण्यास्तत्र वाहिन्यः स्वैरिण्यो व्यवहन् पुरा ।
ग्राहान् कर्कटकांश्चैव मत्स्यांश्च विविधान् बहून् ॥ ६ ॥
राजा सुहोत्रके राज्यमें पहले स्वच्छन्द गतिसे बहनेवाली स्वर्णरससे भरी हुई सरिताएँ सुवर्णमय ग्राहों, केकड़ों, मत्स्यों तथा नाना प्रकारके बहुसंख्यक जल-जन्तुओंको अपने

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 408, कुल 3237 में से · SarvaKosh