महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3149, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरीक्षन्तः पदं शूराः क्षिप्रमेव यशस्विनि ॥ १५ ॥
'यशस्विनि! अपने पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर सदा सावधान रहनेवाले पुरुषप्रवर पाण्डव हमारा चरणचिह्न देखते हुए शीघ्र ही हमलोगोंका पीछा करेंगे ॥
तेषां तु कदनं कृत्वा संस्थातुं नोत्सहामहे ।
अनुजानीहि नो राज्ञि मा च शोके मनः कृथाः ॥ १६ ॥
'रानीजी! उनके पुत्रों और सम्बन्धियोंका विनाश करके हम यहाँ ठहर नहीं सकते; अतः हमें जानेकी आज्ञा दीजिये और आप भी अपने मनसे शोकको निकाल दीजिये ॥
राजंस्त्वमनुजानीहि धैर्यमातिष्ठ चोत्तमम् ।
दिष्टान्तं पश्य चापि त्वं क्षात्रं धर्मं च केवलम् ॥ १७ ॥
(फिर वे धृतराष्ट्रसे बोले—) 'राजन्! आप भी हमें जानेकी आज्ञा प्रदान करें और महान् धैर्यका आश्रय लें, केवल क्षात्रधर्मपर दृष्टि रखकर इतना ही देखें कि उनकी मृत्यु कैसे हुई है?' ॥ १७ ॥
इत्येवमुक्त्वा राजानं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च भारत ॥ १८ ॥
अवेक्षमाणा राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
गङ्गामनु महाराज तूर्णमश्वानचोदयन् ॥ १९ ॥
भारत! राजासे ऐसा कहकर उनकी प्रदक्षिणा करके कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामाने मनीषी राजा धृतराष्ट्रकी ओर देखते हुए तुरंत ही गङ्गातटकी ओर अपने घोड़े हाँक दिये ॥ १८-१९ ॥
अपक्रम्य तु ते राजन् सर्व एव महारथाः ।
आमन्त्र्यान्योन्यमुद्विग्नास्त्रिधा ते प्रययुस्तदा ॥ २० ॥
राजन्! वहाँसे हटकर वे सभी महारथी उद्विग्न हो एक-दूसरेसे विदा ले तीन मार्गोंपर चल दिये ॥ २० ॥
जगाम हास्तिनपुरं कृपः शारद्वतस्तदा ।
स्वमेव राष्ट्रं हार्दिक्यो द्रौणिर्व्यासाश्रमं ययौ ॥ २१ ॥
शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य तो हस्तिनापुर चले गये, कृतवर्मा अपने ही देशकी ओर चल दिया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने व्यास-आश्रमकी राह ली ॥ २१ ॥
एवं ते प्रययुर्वीरा वीक्षमाणाः परस्परम् ।
भयार्ताः पाण्डुपुत्राणामागस्कृत्वा महात्मनाम् ॥ २२ ॥
महात्मा पाण्डवोंका अपराध करके भयसे पीड़ित हुए वे तीनों वीर इस प्रकार एक-दूसरेकी ओर देखते हुए वहाँसे खिसक गये ॥ २२ ॥
समेत्य वीरा राजानं तदा त्वनुदिते रवौ ।
विप्रजग्मुर्महात्मानो यथेच्छकमरिंदमाः ॥ २३ ॥