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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3148, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3148

ध्रुवं सम्प्राप्य लोकांस्ते निर्मलान् शस्त्रनिर्जितान् ।
भास्वरं देहमास्थाय विहरन्त्यमरा इव ॥ ७ ॥
‘निश्चय ही वे शस्त्रोंद्वारा जीते हुए निर्मल लोकोंमें पहुँचकर तेजस्वी शरीर धारण करके वहाँ देवताओंके समान विहार करते होंगे ॥ ७ ॥
न हि कश्चिद्धि शूराणां युद्ध्यमानः पराङ्मुखः ।
शस्त्रेण निधनं प्राप्तो न च कश्चित् कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥
‘उन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्ध करते समय पीठ नहीं दिखा सका है। किसीने भी शत्रुके सामने हाथ नहीं जोड़े हैं। सभी शस्त्रके द्वारा मारे गये हैं ॥ ८ ॥
एवं तां क्षत्रियस्याहुः पुराणाः परमां गतिम् ।
शस्त्रेण निधनं संख्ये तन्न शोचितुमर्हसि ॥ ९ ॥
‘इस प्रकार युद्धमें जो शस्त्रद्वारा मृत्यु होती है, उसे प्राचीन महर्षि क्षत्रियके लिये उत्तम गति बताते हैं; अतः उनके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
न चापि शत्रवस्तेषामृद्ध्यन्ते राज्ञि पाण्डवाः ।
शृणु यत् कृतमस्माभिरश्वत्थामपुरोगमैः ॥ १० ॥
‘महारानी! उनके शत्रु पाण्डव भी विशेष लाभमें नहीं हैं। अश्वत्थामाको आगे करके हमने जो कुछ किया है, उसे सुनिये ॥ १० ॥
अधर्मेण हतं श्रुत्वा भीमसेनेन ते सुतम् ।
सुप्तं शिबिरमासाद्य पाण्डूनां कदनं कृतम् ॥ ११ ॥
‘भीमसेनेने आपके पुत्रको अधर्मसे मारा है, यह सुनकर हमलोग भी पाण्डवोंके सोते हुए शिविरमें जा पहुँचे और पाण्डववीरोंका संहार कर डाला ॥ ११ ॥
पञ्चाला निहताः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रौपदेयाश्च पातिताः ॥ १२ ॥
‘द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्न आदि सारे पांचाल मार डाले गये और द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको भी हमने मार गिराया ॥
तथा विशसनं कृत्वा पुत्रशत्रुगणस्य ते ।
प्राद्रवाम रणे स्थातुं न हि शक्ष्यामहे त्रयः ॥ १३ ॥
‘इस प्रकार आपके पुत्रके शत्रुओंका रणभूमिमें संहार करके हम तीनों भागे जा रहे हैं। अब यहाँ ठहर नहीं सकते ॥ १३ ॥
ते हि शूरा महेष्वासाः क्षिप्रमेष्यन्ति पाण्डवाः ।
अमर्षवशमापन्ना वैरं प्रतिजिहीर्षवः ॥ १४ ॥
‘क्योंकि अमर्षमें भरे हुए वे महाधनुर्धर वीर पाण्डव वैरका बदला लेनेकी इच्छासे शीघ्र यहाँ आयेंगे ॥ १४ ॥
ते हतानात्मजान् श्रुत्वाप्रमत्ताः पुरुषर्षभाः ।