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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2830, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2830

‘जैसे देवराज इन्द्र सदा भयसे हमलोगोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी समस्त सरिताओंके अधिपति हो जाइये (और हमारी रक्षा कीजिये) ।। ६ १/२ ।।
वासश्च ते सदा देव सागरे मकरालये ।। ७ ।।
समुद्रोऽयं तव वशे भविष्यति नदीपतिः ।
सोमेन सार्धं च तव हानिवृद्धी भविष्यतः ।। ८ ।।
‘देव! मकरालय समुद्रमें आपका सदा निवासस्थान होगा और यह नदीपति समुद्र सदा आपके वशमें रहेगा। चन्द्रमाके साथ आपकी भी हानि और वृद्धि होगी’ ।।
एवमस्त्विति तान् देवान् वरुणो वाक्यमब्रवीत् ।
समागम्य ततः सर्वे वरुणं सागरालयम् ।। ९ ।।
अपां पतिं प्रचक्रुर्हि विधिदृष्टेन कर्मणा ।
तब वरुणने उन देवताओंसे कहा—‘एवमस्तु’। इस प्रकार उनकी अनुमति पाकर सब देवता इकट्ठे होकर उन्होंने समुद्रनिवासी वरुणको शास्त्रीय विधिके अनुसार जलका राजा बना दिया ।। ९ १/२ ।।
अभिषिच्य ततो देवा वरुणं यादसां पतिम् ।। १० ।।
जग्मुः स्वान्येव स्थानानि पूजयित्वा जलेश्वरम् ।
जलजन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणका अभिषेक और पूजन करके सम्पूर्ण देवता अपने-अपने स्थानको ही चले गये ।। १० १/२ ।।
अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महायशाः ।। ११ ।।
सरितः सागरांश्चैव नदांश्चापि सरांसि च ।
पालयामास विधिना यथा देवान् शतक्रतुः ।। १२ ।।
देवताओंद्वारा अभिषिक्त होकर महायशस्वी वरुण देवगणोंकी रक्षा करनेवाले इन्द्रके समान सरिताओं, सागरों, नदों और सरोवरोंका भी विधिपूर्वक पालन करने लगे ।।
ततस्तत्राप्युपस्पृश्य दत्त्वा च विविधं वसु ।
अग्नितीर्थं महाप्राज्ञो जगामाथ प्रलम्बहा ।। १३ ।।
प्रलम्बासुरका वध करनेवाले महाज्ञानी बलरामजी उस तीर्थमें स्नान और भाँति-भाँतिके धनका दान करके अग्नितीर्थमें गये ।। १३ ।।
नष्टो न दृश्यते यत्र शमीगर्भे हुताशनः ।
लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ ।। १४ ।।
उपतस्थुः सुरा यत्र सर्वलोकपितामहम् ।
अग्निः प्रणष्टो भगवान् कारणं च न विद्महे ।। १५ ।।
सर्वभूतक्षयो मा भूत् सम्पादय विभोऽनलम् ।