सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1797, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1797

‘भूपाल! बलवान्, महामनस्वी और सत्यपराक्रमी कुन्तीकुमार मेरी शेष सेनाको जिस तरह भी नष्ट न कर सकें, ऐसा उपाय कीजिये ।। १५ ।।
हतवीरमिदं सैन्यं पाण्डवैः समरे विभो ।
कर्णो ह्येको महाबाहुरस्मत्प्रियहिते रतः ।। १६ ।।
‘प्रभो! पाण्डवोंने समरांगणमें मेरी सेनाके प्रमुख वीरोंको मार डाला है। एक महाबाहु कर्ण ही ऐसा है, जो हमारे प्रिय एवं हितसाधनमें लगा हुआ है ।। १६ ।।
भवांश्च पुरुषव्याघ्र सर्वलोकमहारथः ।
शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धुमिच्छति संयुगे ।। १७ ।।
‘पुरुषसिंह शल्य! दूसरे आप भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात महारथी होकर हमारे हितसाधनमें संलग्न हैं। आज कर्ण रणभूमिमें अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहता है ।। १७ ।।
तस्मिञ्जयाशा विपुला मद्रराज नराधिप ।
तस्याभीषुग्रहवरो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन ।। १८ ।।
‘मद्रराज! नरेश्वर! उसके मनमें विजयकी बड़ी भारी आशा है, परंतु उसके घोड़ोंकी रास पकड़नेवाला (आपके समान) दूसरा कोई इस भूतलपर नहीं है ।।
पार्थस्य समरे कृष्णो यथाभीषुग्रहो वरः ।
तथा त्वमपि कर्णस्य रथेऽभीषुग्रहो भव ।। १९ ।।
‘जैसे संग्रामभूमिमें अर्जुनके रथकी बागडोर सँभालनेवाले श्रेष्ठ सारथि श्रीकृष्ण हैं, उसी प्रकार आप भी कर्णके रथपर बैठकर उसकी बागडोर अपने हाथमें लीजिये ।।
तेन युक्तो रणे पार्थो रक्ष्यमाणश्च पार्थिव ।
यानि कर्माणि कुरुते प्रत्यक्षाणि तथैव तत् ।। २० ।।
‘राजन्! श्रीकृष्णसे संयुक्त एवं सुरक्षित होकर पार्थ रणभूमिमें जो-जो कर्म करते हैं, वे सब आपकी आँखोंके सामने हैं ।। २० ।।
पूर्वं न समरे ह्येवमवधीदर्जुनो रिपून् ।
इदानीं विक्रमो ह्यस्य कृष्णेन सहितस्य च ।। २१ ।।
‘पहले युद्धमें अर्जुन इस प्रकार शत्रुओंका वध नहीं करते थे। इस समय श्रीकृष्णके साथ होनेसे ही इनका पराक्रम बढ़ गया है ।। २१ ।।
कृष्णेन सहितः पार्थो धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् ।
अहन्यहनि मद्रेश द्रावयन् दृश्यते युधि ।। २२ ।।
‘मद्रराज! श्रीकृष्णके साथ अर्जुन प्रतिदिन हमारी विशाल सेनाको युद्धभूमिमें खदेड़ते देखे जाते हैं ।। २२ ।।
भागोऽवशिष्टः कर्णस्य तव चैव महाद्युते ।
तं भागं सह कर्णेन युगपन्नाशयाद्य हि ।। २३ ।।