महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1796, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस पाहि सर्वथा कर्णं यथा ब्रह्मा महेश्वरम् ॥ ७ ॥
यथा च सर्वथाऽऽपत्सु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् ।
तथा मद्रेश्वराद्य त्वं राधेयं प्रतिपालय ॥ ८ ॥
‘जैसे ब्रह्माजीने सारथि बनकर महादेवजीकी रक्षा की थी और जैसे सब प्रकारकी आपत्तियोंसे श्रीकृष्ण अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये। मद्रराज! आज आप राधापुत्रका प्रतिपालन कीजिये॥
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णोभवान् भोजश्च वीर्यवान् ।
शकुनिः सौबलो द्रौणिरहमेव च नो बलम् ॥ ९ ॥
‘भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य कर्ण, आप, पराक्रमी कृतवर्मा, सुबलपुत्र शकुनि, द्रोणकुमार अश्वत्थामा और मैं—ये ही हमारे बल हैं॥ ९॥
एवमेष कृतो भागो नवधा पृथिवीपते ।
न च भागोऽत्र भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १० ॥
ताभ्यामतीत्य तौ भागौ निहता मम शत्रवः ।
‘पृथ्वीपते! इस प्रकार मेरी सेनाके ये नौ भाग किये गये थे। अब यहाँ भीष्म तथा महात्मा द्रोणाचार्यका भाग नहीं रह गया है। उन दोनोंने उनके लिये निर्धारित भागोंसे और आगे बढ़कर मेरे शत्रुओंका संहार किया है॥ १० १/२ ॥
वृद्धौ हि तौ महेष्वासौ छलेन निहतौ युधि ॥ ११ ॥
कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ स्वर्गमितोऽनघ ।
तथान्ये पुरुषव्याघ्राः परैर्विनिहता युधि ॥ १२ ॥
‘वे दोनों महाधनुर्धर योद्धा बूढ़े हो गये थे, इसलिये युद्धमें शत्रुओंद्वारा छलपूर्वक मारे गये। अनघ! वे दुष्कर कर्म करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये। इसी प्रकार दूसरे पुरुषसिंह वीर भी युद्धमें शत्रुओंद्वारा मारे गये हैं॥ ११-१२॥
अस्मदीयाश्च बहवः स्वर्गायोपगता रणे ।
त्यक्त्वा प्राणान् यथाशक्ति चेष्टां कृत्वा च पुष्कलाम् ॥ १३ ॥
‘मेरे पक्षके बहुत-से योद्धा विजयके लिये यथाशक्ति पूरी चेष्टा करके रणभूमिमें प्राण त्यागकर स्वर्गलोकको चले गये॥ १३॥
तदिदं हतभूयिष्ठं बलं मम नराधिप ।
पूर्वमप्यल्पकैः पार्थैर्हतं किमुत साम्प्रतम् ॥ १४ ॥
‘नरेश्वर! इस प्रकार मेरी इस सेनाका अधिकांश भाग नष्ट हो चुका है। पहले भी जब अपनी सारी सेना मौजूद थी, अल्पसंख्यक कुन्तीकुमारोंने कौरवसेनाका नाश कर दिया था। फिर इस समय तो कहना ही क्या है? ॥ १४ ॥
बलवन्तो महात्मानः कौन्तेयाः सत्यविक्रमाः ।
बलं शेषं न हन्युर्मे यथा तत् कुरु पार्थिव ॥ १५ ॥