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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 162

तदनन्तर संशप्तकोंने दस-दस तीखे बाणोंसे पुनः अर्जुनको बींध डाला, यह देख उन कुन्तीकुमारने भी तीन-तीन बाणोंसे संशप्तकोंको घायल कर दिया ।। १३ ।।
एकैकस्तु ततः पार्थ राजन् विव्याध पञ्चभिः ।
स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमी ।। १४ ।।
राजन्! फिर उनमेंसे एक-एक योद्धाने अर्जुनको पाँच-पाँच बाणोंसे बींध डाला और पराक्रमी अर्जुनने भी दो-दो बाणोंद्वारा उन सबको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ।। १४ ।।
भूय एव तु संक्रुद्धास्त्वर्जुनं सहकेशवम् ।
आपूरयन् शरैस्तीक्ष्णैस्तडागमिव वृष्टिभिः ।। १५ ।।
तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हो संशप्तकोंने पुनः श्रीकृष्णसहित अर्जुनको पैने बाणोंद्वारा उसी प्रकार परिपूर्ण करना आरम्भ किया, जैसे मेघ वर्षाद्वारा सरोवरको पूर्ण करते हैं ।। १५ ।।
ततः शरसहस्राणि प्रापतन्नर्जुनं प्रति ।
भ्रमराणामिव व्राताः फुल्लं द्रुमगणं वने ।। १६ ।।
तत्पश्चात् अर्जुनपर एक ही साथ हजारों बाण गिरे, मानो वनमें फूले हुए वृक्षपर भौरोंके समूह आ गिरे हों ।। १६ ।।
ततः सुबाहुस्त्रिंशद्भिरद्रिसारमयैः शरैः ।
अविध्यदिषुभिर्गाढं किरीटे सव्यसाचिनम् ।। १७ ।।
तदनन्तर सुबाहुने लोहेके बने हुए तीस बाणोंद्वारा अर्जुनके किरीटमें गहरा आघात किया ।। १७ ।।
तैः किरीटी किरीटस्थैर्हेमपुङ्खैरजिह्मगैः ।
शातकुम्भमयापीडो बभौ सूर्य इवोत्थितः ।। १८ ।।
सोनेके पंखोंसे युक्त सीधे जानेवाले वे बाण उनके किरीटमें चारों ओरसे धँस गये। उन बाणोंद्वारा किरीटधारी अर्जुनकी वैसी ही शोभा हुई जैसे स्वर्णमय मुकुटसे मण्डित भगवान् सूर्य उदित एवं प्रकाशित हो रहे हों ।। १८ ।।
हस्तावापं सुबाहोस्तु भल्लेन युधि पाण्डवः ।
चिच्छेद तं चैव पुनः शरवर्षैरवाकिरत् ।। १९ ।।
तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्लका प्रहार करके युद्धमें सुबाहुके दस्तानेको काट दिया और उसके ऊपर पुनः बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। १९ ।।
ततः सुशर्मा दशभिः सुरथस्तु किरीटिनम् ।
सुधर्मा सुधनुश्चैव सुबाहुश्च समार्पयत् ।। २० ।।
यह देख सुशर्मा, सुरथ, सुधर्मा, सुधन्वा और सुबाहुने दस-दस बाणोंसे किरीटधारी अर्जुनको घायल कर दिया ।। २० ।।