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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 161

भगवान् हृषीकेशसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने युद्धमें त्रिगतोंकी व्यूहाकार खड़ी हुई सेनापर आक्रमण किया ।। ७ ।।
स देवदत्तमादाय शङ्खं हेमपरिष्कृतम् ।
दध्मौ वेगेन महता घोषेणापूरयन् दिशः ।। ८ ।।
उन्होंने सुवर्णजटित देवदत्त नामक शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए उसे बड़े वेगसे बजाया ।। ८ ।।
तेन शब्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी ।
विचेष्टावस्थिता संख्ये ह्यश्मसारमयी यथा ।। ९ ।।
उस शंखनादसे भयभीत हो वह संशप्तक-सेना युद्धभूमिमें लोहेकी प्रतिमाके समान निश्चेष्ट खड़ी हो गयी ।। ९ ।।
(सा सेना भरतश्रेष्ठ निश्चेष्टा शुशुभे तदा ।
चित्र पटे यथा न्यस्ता कुशलैः शिल्पिभिनरैः ।।
भरतश्रेष्ठ! वह निश्चेष्ट हुई सेना ऐसी सुशोभित हुई, मानो कुशल कलाकारोंद्वारा चित्रपटमें अंकित की गयी हो।
स्वनेन तेन सैन्यानां दिवमावृण्वता तदा ।
सस्वना पृथिवी सर्वा तथैव च महोदधिः ।।
स्वनेन सर्वसैन्यानां कर्णांस्तु बधिरीकृताः ।)
सम्पूर्ण आकाशमें फैले हुए उस शंखनादने समूची पृथ्वी और महासागरको भी प्रतिध्वनित कर दिया। उस ध्वनिसे सम्पूर्ण सैनिकोंके कान बहरे हो गये।
वाहास्तेषां विवृत्ताक्षाः स्तब्धकर्णशिरोधराः ।
विष्टब्धचरणा मूत्रं रुधिरं च प्रसुस्रुवुः ।। १० ।।
उनके घोड़े आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उनके कान और गर्दन स्तब्ध हो गये, चारों पैर अकड़ गये और वे मूत्रके साथ-साथ रुधिरका भी त्याग करने लगे ।। १० ।।
उपलभ्य ततः संज्ञांमवस्थाप्य च वाहिनीम् ।
युगपत् पाण्डुपुत्राय चिक्षिपुः कङ्कपत्रिणः ।। ११ ।।
थोड़ी देरमें चेत होनेपर संशप्तकोंने अपनी सेनाको स्थिर किया और एक साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनपर कंकपक्षीकी पाँखवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ११ ।।
तान्यर्जुनः सहस्राणि दशपञ्चभिराशुगैः ।
अनागतान्येव शरैंश्चिच्छेदाशु पराक्रमी ।। १२ ।।
परंतु पराक्रमी अर्जुनने पंद्रह शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उनके सहस्रों बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही शीघ्रतापूर्वक काट डाला ।। १२ ।।
ततोऽर्जुनं शितैर्बाणैर्दशभिर्दशभिः पुनः ।
प्राविध्यन्त ततः पार्थस्तानविध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः ।। १३ ।।