महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८- राजा शिबिके यज्ञ और दानकी महत्ता
५९- भगवान् श्रीरामका चरित्र
६०- राजा भगीरथका चरित्र
६१- राजा दिलीपका उत्कर्ष
६२- राजा मान्धाताकी महत्ता
६३- राजा ययातिका उपाख्यान
६४- राजा अम्बरीषका चरित्र
६५- राजा शशबिन्दुका चरित्र
६६- राजा गयका चरित्र
६७- राजा रन्तिदेवकी महत्ता
६८- राजा भरतका चरित्र
६९- राजा पृथुका चरित्र
७०- परशुरामजीका चरित्र
७१- नारदजीका संजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना
(प्रतिज्ञापर्व)
७२- अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध
७३- युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा
७४- जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना
७५- श्रीकृष्णका अर्जुनको कौरवोंके जयद्रथकी रक्षाविषयक उद्योगका समाचार बताना
७६- अर्जुनके वीरोचित वचन
७७- नाना प्रकारके अशुभसूचक उत्पात, कौरव-सेनामें भय और श्रीकृष्णका अपनी बहिन सुभद्राको आश्वासन देना
७८- सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन
७९- श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन
८०- अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना
८१- अर्जुनको स्वप्नमें ही पुनः पाशुपतास्त्रकी प्राप्ति