सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 429

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विषष्टितमोऽध्यायः

राजा मान्धाताकी महत्ता

नारद उवाच

मान्धाता चेद्यौवनाश्वो मृतः सृञ्जय शुश्रुम ।
देवासुरमनुष्याणां त्रैलोक्यविजयी नृपः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता भी मरे थे, यह सुना गया है। वे देवता, असुर और मनुष्य—तीनों लोकोंमें विजयी थे ॥ १ ॥

यं देवावश्विनौ गर्भात् पितुः पूर्वं चकर्षतुः ।
मृगयां विचरन् राजा तृषितः क्लान्तवाहनः ॥ २ ॥
पूर्वकालमें दोनों अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उन्हें पिताके पेटसे निकाला था। एक समयकी बात है, राजा युवनाश्व वनमें शिकार खेलनेके लिये विचर रहे थे। वहाँ उनका घोड़ा थक गया और उन्हें भी प्यास लग गयी ॥ २ ॥

धूमं दृष्ट्वागमत् सत्रं पृषदाज्यमवाप सः ।
तं दृष्ट्वा युवनाश्वस्य जठरे सूनुतां गतम् ॥ ३ ॥
गर्भाद्वि जहतुर्देवावश्विनौ भिषजां वरौ ।
इतनेमें दूरसे उठता हुआ धूआँ देखकर वे उसी ओर चले और एक यज्ञमण्डपमें जा पहुँचे। वहाँ एक पात्रमें रखे हुए घृतमिश्रित अभिमन्त्रित जलको उन्होंने पी लिया। उस जलको युवनाश्वके पेटमें पुत्ररूपमें परिणत हुआ देख वैद्योंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार नामक देवताओंने उसे पिताके गर्भसे बाहर निकाला ॥ ३ १/२ ॥

तं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देववर्चसम् ॥ ४ ॥
अन्योन्यमब्रुवन् देवाः कमयं धास्यतीति वै ।
मामेवायं धयत्वग्रे इति ह स्माह वासवः ॥ ५ ॥
देवताके समान तेजस्वी उस शिशुको पिताकी गोदमें शयन करते देख देवता आपसमें कहने लगे, यह किसका दूध पीयेगा? यह सुनकर इन्द्रने कहा—यह पहले मेरा ही दूध पीये ॥ ४-५ ॥

ततोऽङ्गुलिभ्यो हीन्द्रस्य प्रादुरासीत् पयोऽमृतम् ।
मां धास्यतीति कारुण्याद् यदिन्द्रो ह्यन्वकम्पयत् ॥ ६ ॥
तस्मात्तु मान्धातेत्येवं नाम तस्याद्भुतं कृतम् ।
तदनन्तर इन्द्रकी अंगुलियोंसे अमृतमय दूध प्रकट हो गया; क्योंकि इन्द्रने करुणावश ‘मां धास्यति’ (मेरा दूध पीयेगा) ऐसा कहकर उसपर कृपा की थी, इसलिये उसका ‘मान्धाता’ यह अद्भुत नाम निश्चित कर दिया गया ॥ ६ १/२ ॥