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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 894, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 894

अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे ।
तस्मात् तेऽद्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम् ॥ २५ ॥
राजाने कहा— बाज! तुम जो मेरा मांस माँग रहे हो इसे मैं अपने ऊपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा मानता हूँ, अतः मैं अभी अपना मांस तराजूपर रखकर तुम्हें दिये देता हूँ ॥ २५ ॥

लोमश उवाच

उत्कृत्य स स्वयं मांसं राजा परमधर्मवित् ।
तोलयामास कौन्तेय कपोतेन समं विभो ॥ २६ ॥
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् परम धर्मज्ञ राजा उशीनरने स्वयं अपना मांस काटकर उस कबूतरके साथ तौलना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

ध्रियमाणः कपोतस्तु मांसेनात्यतिरिच्यते ।
पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनरः ॥ २७ ॥
न विद्यते यदा मांसं कपोतेन समं धृतम् ।
तत उत्कृत्तमांसोऽसावारुरोह स्वयं तुलाम् ॥ २८ ॥
किंतु दूसरे पलड़ेमें रखा हुआ कबूतर उस मांसकी अपेक्षा अधिक भारी निकला, तब महाराज उशीनरने पुनः अपना मांस काटकर चढ़ाया। इस प्रकार बार-बार करनेपर भी जब