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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 554

भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज नल जूआ खेलनेके कारण अपनी पत्नीसहित इस प्रकारके महान् संकटमें पड़ गये थे ॥ ६ ॥
एकाकिनैव सुमहान्नलेन पृथिवीपते ।
दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदयः पुनः ॥ ७ ॥
पृथिवीपते! राजा नलने अकेले ही यह भयंकर और महान् दुःख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदयकी प्राप्ति हुई ॥ ७ ॥
त्वं पुनर्भातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव ।
रमसेऽस्मिन् महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदीके साथ इस महान् वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो ॥ ८ ॥
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।
नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥
राजन्! महान् भाग्यशाली वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थितिमें शोककी क्या बात है? ॥ ९ ॥
कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च ।
ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥ १० ॥
कर्कोटक नाग, दमयन्ती, नल तथा राजर्षि ऋतुपर्णकी चर्चा कलियुगके दोषका नाश करनेवाली है ॥ १० ॥
इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत ।
शक्यमाश्वसितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशाम्पते ॥ ११ ॥
महाराज! तुम्हारे-जैसे लोगोंको यह कलिनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है ॥ ११ ॥
अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा ।
तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥ १२ ॥
पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥
श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्वसिहि मा शुचः ।
व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमर्हसि ॥ १३ ॥
नरेश! इस इतिहासको सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो, महाराज! तुम्हें संकटमें पड़नेपर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये ॥ १३ ॥
विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।
विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥ १४ ॥