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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1341, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1341

एकं हि मे सायकं चित्ररूपं
दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् ।
येन विद्धो वामदेवः शयीत
संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥ ६२ ॥
‘सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ, जो विषमें बुझाकर रखा गया हो, जिससे घायल होकर यह वामदेव धरतीपर लोट जाय। इसे कुत्ते नोच-नोचकर खायँ और यह पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा पीड़ासे छटपटाता रहे’ ॥ ६२ ॥

वामदेव उवाच

जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं
जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र ।
तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न-
स्तूर्ण प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥ ६३ ॥
वामदेवने कहा—नरेन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हारी रानीके गर्भसे श्येनजित् नामक एक पुत्र पैदा हुआ है, जो तुम्हें बहुत प्रिय है और जिसकी अवस्था दस वर्षकी हो गयी है। तुम मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर इन भयंकर बाणोंद्वारा अपने उसी पुत्रका शीघ्र वध करोगे ॥ ६३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्तो वामदेवेन राज-
न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान ।
स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः
श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! वामदेवके ऐसा कहते ही उस प्रचण्ड तेजस्वी बाणने धनुषसे छूटकर रनवासके भीतर जा राजकुमारका वध कर डाला। यह समाचार सुनकर दलने वहाँ पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६४ ॥

राजोवाच

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं
निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य ।
आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः
पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥ ६५ ॥
राजाने कहा—इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ। आज इस ब्राह्मणको रौंदकर मार डालूँगा। एक-दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और आज मेरा पराक्रम