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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1340, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1340

एवमुक्ते वामदेवेन राजन्
समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः ।
तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा
प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! वामदेवकी यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये। उनके हाथमें त्रिशूल थे। जब वे राजापर चोट करने लगे, तब राजाने उच्च स्वरसे यह बात कही— ॥ ५७ ॥

इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु-
र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि ।
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ
नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥
‘यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके-जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं’ ॥ ५८ ॥

एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै-
र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः ।
ततो विदित्वा नृपतिं निपातित-
मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५९ ॥
ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसोंसे मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये। इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दलका राज्याभिषेक कर दिया ॥ ५९ ॥

राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः
प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः ।
दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय-
मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥
तब पुनः उस राज्यमें जाकर विप्रवर वामदेवने राजा दलसे यह बात कही—‘महाराज! ब्राह्मणोंकी वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मोंमें देखी गयी है ॥ ६० ॥

बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र
प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ ।
एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं
स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥
‘नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वोंको लौटा दो।’ वामदेवकी यह बात सुनकर राजाने रोषपूर्वक अपने सारथिसे कहा— ॥ ६१ ॥