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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1295, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1295

अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम ।
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९८ ॥
‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है’ ॥ ९८ ॥
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम ।
निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥
उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ ॥ ९९ ॥
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् ।
तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥
तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया ॥ १०० ॥
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप ।
सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥
राजन्! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी ॥ १०१ ॥
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् ।