महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे ॥ ९१-९२ ॥
ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् ।
कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९३ ॥
पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा—'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?' ॥ ९३ ॥
तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये ।
भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९४ ॥
नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका ॥ ९४ ॥
अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः ।
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९५ ॥
उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था ॥ ९५ ॥
ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः ।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९६ ॥
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम् ।
मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९७ ॥
मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा—'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।।