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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 745

त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।।
निषाद बोला— पृथ्वीपते! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।।

वैशम्पायन उवाच

नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः ।
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।।

स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः ।
प्रत्यायाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।।
कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।।

ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् ।
पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। ५९ ।।
तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे—चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले— ।। ५९ ।।

सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः ।
तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।।
‘पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।।

ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन ।
न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।।
‘राजन्! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।।

व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै ।
एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।।
‘आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।’ पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया— ।। ६२ ।।

असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु ।
अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत ।। ६३ ।।