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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 744

‘पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।।
समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप ।
न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ।। ५४ ।।
‘राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा’ ।। ५४ ।।

शान्तनुरुवाच
श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव ।
दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।।
शान्तनुने कहा— निषाद! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।।

दाश उवाच
अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते ।