महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदा उपस्थित रहेगा ।। १३ ।।
त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थितः ।
चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव ।। १४ ।।
सम्पूर्ण मनुष्योंमें एक तुम्हीं इस श्रेष्ठ विमानपर बैठकर मूर्तिमान् देवताकी भाँति सबके ऊपर-ऊपर विचरोगे ।। १४ ।।
ददामि ते वैजयन्तीं मालाम्म्लानपंकजम् ।
धारयिष्यति संग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम् ।। १५ ।।
मैं तुम्हें यह वैजयन्ती माला देता हूँ, जिसमें पिरोये हुए कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं। इसे धारण कर लेनेपर यह माला संग्राममें तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे बचायेगी ।। १५ ।।
लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप ।
इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत् ।। १६ ।।
नरेश्वर! यह माला ही इन्द्रमालाके नामसे विख्यात होकर इस जगत्में तुम्हारी पहचान करानेके लिये परम धन्य एवं अनुपम चिह्न होगी ।। १६ ।।
यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः ।
इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम् ।। १७ ।।
ऐसा कहकर वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने राजाको प्रेमोपहारस्वरूप बाँसकी एक छड़ी दी, जो शिष्ट पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली थी ।। १७ ।।
तस्याः शक्रस्य पूजार्थं भूमौ भूमिपतिस्तदा ।
प्रवेशं कारयामास गते संवत्सरे तदा ।। १८ ।।
तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर भूपाल वसुने इन्द्रकी पूजाके लिये उस छड़ीको भूमिमें गाड़ दिया ।। १८ ।।
ततः प्रभृति चाद्यापि यष्टेः क्षितिपसत्तमैः ।
प्रवेशः क्रियते राजन् यथा तेन प्रवर्तितः ।। १९ ।।
राजन्! तबसे लेकर आजतक श्रेष्ठ राजाओंद्वारा छड़ी धरतीमें गाड़ी जाती है। वसुने जो प्रथा चला दी, वह अबतक चली आती है ।। १९ ।।
अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपैः ।
अलंकृतायाः पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणैः ।। २० ।।
माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवत् क्रियतेऽपि च ।
भगवान् पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वरः ।। २१ ।।
दूसरे दिन अर्थात् नवीन संवत्सरके प्रथम दिन प्रति-पदाको वह छड़ी वहाँसे निकालकर बहुत ऊँचे स्थानमें रखी जाती है; फिर कपड़ेकी पेटी, चन्दन, माला और आभूषणोंसे उसको सजाया जाता है। उसमें विधिपूर्वक फूलोंके हार और सूत लपेटे जाते