महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोके धर्मं पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः ।
धर्मयुक्तस्ततो लोकान् पुण्यान् प्राप्स्यसि शाश्वतान् ॥ ६ ॥
इन्द्रने कहा— राजन्! तुम इस लोकमें सदा सावधान और प्रयत्नशील रहकर धर्मका पालन करो। धर्मयुक्त रहनेपर तुम सनातन पुण्यलोकोंको प्राप्त कर सकोगे ॥ ६ ॥
दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः ।
रम्यः पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप ॥ ७ ॥
यद्यपि मैं स्वर्गमें रहता हूँ और तुम भूमिपर; तथापि आजसे तुम मेरे प्रिय सखा हो गये। नरेश्वर! इस पृथ्वीपर जो सबसे सुन्दर एवं रमणीय देश हो, उसीमें तुम निवास करो ॥ ७ ॥
पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।
स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः ॥ ८ ॥
अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः ।
वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप ॥ ९ ॥
धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः ।
न च मिथ्याप्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १० ॥
न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः ।
युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान् संधुक्षयन्ति च ॥ ११ ॥
सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु यद् भवेत् ॥ १२ ॥
इस समय चेदिदेश पशुओंके लिये हितकर, पुण्यजनक, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, स्वर्गके समान सुखद होनेके कारण रक्षणीय, सौम्य तथा भोग्य पदार्थों और भूमिसम्बन्धी उत्तम गुणोंसे युक्त है। यह देश अनेक पदार्थोंसे युक्त और धन-रत्न आदिसे सम्पन्न है। यहाँकी वसुधा वास्तवमें वसु (धन-सम्पत्ति)-से भरी-पूरी है। अतः तुम चेदिदेशके पालक होकर उसीमें निवास करो। यहाँके जनपद धर्मशील, संतोषी और साधु हैं। यहाँ हास-परिहासमें भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरोंपर तो बोल ही कैसे सकता है। पुत्र सदा गुरुजनोंके हितमें लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बँटवारा नहीं करते। यहाँके लोग बैलोंको भार ढोनेमें नहीं लगाते और दीनों एवं अनाथोंका पोषण करते हैं। मानद! चेदिदेशमें सब वर्णोंके लोग सदा अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई घटना होगी, वह सब यहाँ रहते हुए भी तुमसे छिपी न रहेगी—तुम सर्वज्ञ बने रहोगे ॥ ८—१२ ॥
देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् ।
आकाशगं त्वां मदत्तं विमानमुपपत्स्यते ॥ १३ ॥
जो देवताओंके उपभोगमें आने योग्य है, ऐसा स्फटिक मणिका बना हुआ एक दिव्य, आकाशचारी एवं विशाल विमान मैंने तुम्हें भेंट किया है। वह आकाशमें तुम्हारी सेवाके लिये