माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (४१)
हेमन्तकालमें सञ्चित भया कफ वसन्तकालमें ज्वर उत्पन्न करे है तिसके पिछाडी
वात पित्त सहायक होते हैं ॥
काले यथास्वं सर्वेषां प्रवृत्तिर्वृद्धिरेव वा ।
निदानोक्तानुपशयो विपरीतोपशायिता ॥ ५४ ॥
वातादिकोंकी यथायोग्य अपने कालमें उत्पत्ति और वृद्धि होवै है अथवा उत्पत्ति
नित्य ज्वरकी और वृद्धि विषमज्वरकी होती है जैसे-कालमें ये दोष विशेष जान-
नेके लक्षण हैं उसी प्रकार उपशय और अनुपशय भी रोग जाननेके कारण हैं । सो
इस प्रकार जानना-निदानत्व करके जो आहार विहार कहे हैं उनसे सेवन करनेको
अनुपशय कहिये दुःखकी उत्पत्ति होती है और दोषोंके विपरीत जो आहार विहार
उन्होंसे उपशायिता कहिये सुखकी उत्पत्ति होय है ॥
अन्तर्दाहोऽधिका तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । सन्ध्यस्थिशूल-
मस्वेदो दोषवचोर्विनिग्रहः ॥ ५५ ॥ अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि
ज्वरस्यैतानि लक्षये । सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च
मार्दवम् ॥ बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमुच्यते ॥ ५६ ॥
पिछाडी जो ज्वर कहे हैं उन्होंमें सम्प्राप्तिके भेदसे कोई एक ज्वर अंतर्वेग होता
है और कोई ज्वर बहिर्वेग होता है तिन दोनोंके लक्षण कहते हैं-अंतर्दाह, अतितृषा,
बड़बडाना, श्वास, भ्रम, संधि और हाड इनमें पीडा, पसीना न आवे, वायु और
मलका बाहर न निकलना ये अंतर्वेगज्वरके लक्षण जानने । शरीरके बाहर संताप
अधिक होवे, तृष्णादिक लक्षण थोडे होवें, ये बहिर्वेगज्वरके लक्षण हैं यह ज्वर
सुखसाध्य है इस ज्वरके सुखसाध्य कहनेसे अंतर्वेगज्वर कृच्छ्रसाध्य और असाध्य
हैं; यह सूचना करी ॥
चिकित्सा करनेके निमित्त आम पच्यमान और निराम ज्वरके लक्षण कहते हैं-
लालाप्रसेकहृल्लासहृदयाशुद्ध्यरोचकाः। तन्द्रालस्याविपाकास्य-
वैरस्यं गुरुगात्रता ॥ ५७ ॥ क्षुन्नाशो बहुमूत्रत्वं स्तब्धता
बलवाञ्ज्वरः । आमज्वरस्य लिङ्गानि न दद्यात्तत्र भेषजम्॥५८॥
भेषजं ह्यामदोषस्य भूयो जनयति ज्वरम् । शोधनं शमनीयं च
करोति विषमज्वरम् ॥ ५९ ॥
लारका गिरना, खाली ओकारीका आना, हृदयमें जडत्व, अरुचि, तंद्रा, आलस्य,
अन्नका परिपाक न होना, मुखका स्वाद जाता रहे, देह भारी, भूखका नाश, वारं-
बार मूतना, देहका जकडना, देहमें बलवान् ज्वर हो ये अपक्व ज्वरके लक्षण जानने,