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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 404 में से

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पृष्ठ 257

१० वक्र और दो प्रकारके छिन्न । १ कर्कटक-अर्थात् हाड दोनों ओरसे दबकर
बीचमें ऊंचासा होय । २ अश्वकर्ण-घोडेके कानके समान जो हाड हो जाय ।
३-विचूर्णित चुरकट होगया हो, वह शब्दसे अथवा स्पर्शसे जाना जाय । ४ पिच्चित-
पिचा भया हाड । ५ अस्थिछल्लिका-हाडका कोई भाग छिलकेके समान उखड
कर रहा है सो । ६ कांडभग्न-हड्डीका कांड टूटना । ७ अतिपात-सब हाड टूटे सो ।
८ मज्जागत--हड्डीके अवयव मज्जामें प्रवेश कर मज्जाको बाहर निकाले । ९ स्फुटित--
जिस हड्डीके बहुत टुकटे होजायँ । १० वक्र-हड्डी तिरछी होजाय वह भी भग्नमें
गिनी जाती है । ११-१२ छिन्न-१ बारीक बारीक बहुतसे टुकडे होजायँ सो और
दूसरा एक ओरसे टूटकर दूसरी तरफ निकले है ॥
कांडभग्नके सामान्य लक्षण ।
-स्रस्तांगता शोथरुजातिवृद्धिः ।
सम्पीड्यमाने भवतीह शब्दः स्पर्शासहस्पंदनतोदशूलाः ॥ ५ ॥
सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभो भग्नस्य काण्डे खलु चिह्नमेतत् ।
अंगोंमें शिथिलता, सूजन, घोर पीडा, जिस स्थानकी हड्डी टूटी होय उसजगह
पीडाके साथ शब्द होय, हाथके लगानेसे सहा न जाय, हड्डी फडके, सुई छेदने-
कीसी पीडा होय और शूल होय, कभी चैन न पडे । ‘कांड’ इस शब्दसे, नलक,
कपाल, वलय, तरुण और रुचक इन पांच प्रकारकी हड्डियोंका संग्रह होय है ॥
कांड भग्नके ( १२ ) बारह भेदोंसे अधिक भेद होते हैं उतको कहते हैं ।
भग्नं तु कांडे बहुधा प्रयाति समासतो नामभिरेव तुल्यम् ॥ ६ ॥
कांडोंमें अनेक प्रकारके भंग होते हैं, सो जिस ठिकाने जैसी आकृतिका होय
उसका उसी प्रकारका नाम कहना चाहिये ॥
कष्टसाध्यके लक्षण ।
अल्पाशिनोऽनात्मवतो जन्तोर्वातात्मकस्य च ।
उपद्रवैर्वा जुष्टस्य भग्नं कृच्छ्रेण सिध्यति ॥ ७ ॥
थोडा खानेवाला और जिसकी इन्द्रिय स्वाधीन न होय वात प्रकृतिवालेकी
ज्वरादि उपद्रवसंयुक्त ऐसे पुरुषकी हड्डी टूटनेसे बडे कष्टसे साध्य होती है ॥
असाध्य लक्षण ।
भिन्नं कपालं कट्यां तु संधिमुक्तं तथा च्युतम् ।
जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तु विचक्षणः ॥ ८ ॥