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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 404 में से

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पृष्ठ 248

( २३० ) माधवनिदान ।
इनके मिलनेसे सन्निपातका व्रण जानना इस प्रकार तीनों दोषोंमें रुधिरके सम्ब-
न्धकी कल्पना करनी चाहिये ॥
सुखव्रणके लक्षण ।
त्वङ्मांसजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः ।
धीमतोऽभिनवः काले सुखसाध्यः सुखव्रणः ॥ ६ ॥
जो व्रण त्वचा और मांस तथा मर्मरहित स्थानमें उपद्रवरहित होय और जो
तरुण तथा हिताहित जाननेवाला पुरुषके हेमन्त शिशिरकालमें नवीन प्रगट होय
उसको सुखव्रण कहते हैं, वह सुखसाध्य है ॥
कृच्छ्रसाध्य और असाध्य लक्षण ।
गुणैरन्यतमैर्हीनस्ततः कृच्छ्रो व्रणः स्मृतः ।
सर्वैर्विहीनो विज्ञेयः सोऽसाध्यो निरुपक्रमः ॥ ७ ॥
जो पूर्व श्लोकमें लक्षण कह आये उनमेंसे कुछ लक्षण थोडे होनेसे व्रण कृच्छ्र-
साध्य होय है और सब गुणरहित होय, बहुत उपद्रवयुक्त होय, वह असाध्य है ।
उसकी चिकित्सा न करनी चाहिये ॥
दुष्टव्रणके लक्षण ।
पूतिपूयातिदुष्टासृक्स्राव्युत्सङ्गी चिरस्थितिः ।
दुष्टो व्रणोऽतिगन्धादिः शुद्धलिङ्गविपर्ययः ॥ ८ ॥
जिसमेंसे दुर्गन्धयुक्त राध और अत्यन्त सडा भया रुधिर बहे, जो ऊपरसे उठा
हुआ हो, बहुत दिन रहनेवाला हो, अत्यन्त दुर्गन्ध दुर्वर्ण स्राव पीडायुक्त होय उसको
दुष्टव्रण कहते हैं । वह वक्ष्यमाण शुद्धलिंगसे विपरीत होता है ॥
शुद्धव्रणके लक्षण ।
जिह्वातलाभोऽतिमृदुः श्लक्ष्णः स्निग्धोऽल्पवेदनः ।
सुव्यवस्थो निरास्रावः शुद्धो व्रण इति स्मृतः ॥ ९ ॥
जो व्रण जीभके नीचे भागके समान अत्यन्त नरम होय, स्वच्छ, चिकना, थोडी
पीडायुक्त, भले प्रकारका कहिये ऊंचा आदि जो दुष्ट व्रणादिकमें लक्षण कहे हैं वे
न होय, दोषकृत रक्तादिस्रावरहित होय उसको शुद्धव्रण जानना ॥
भरनेवाले व्रणके लक्षण ।
कपोतवर्णप्रतिमो यस्यान्तः क्लेदवर्जितः ।
स्थिराश्च पिडिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १० ॥

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