लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभिन्नवर्गप्रकारः । ( ३७ )
अत्रोद्देशकः-
भिन्न भागके विषयमें उदाहरण-
सञ्त्र्यंशरूपद्वितयेन पञ्च त्र्यंशेन षष्ठं वद मे विभज्य ॥
दर्भीयगर्भाग्रसुतीक्ष्णबुद्धिश्चेदस्ति ते भिन्नहृतौ समर्था ॥ ७ ॥
अन्वयः-हे सखे ! चेत् ते दर्भीयगर्भाग्रसुतीक्ष्णबुद्धिः भिन्नहृतौ समर्था अस्ति तर्हि सञ्त्र्यंशरूपद्वितयेन पञ्च त्र्यंशेन षष्ठं विभज्य मे वद ॥ ७ ॥
अर्थः-हे मित्र ! यदि तुम्हारी कुशके अग्रभागके समान सूक्ष्मबुद्धि भिन्न भाग देनेमें समर्थ है तो एक १ के तृतीयांशसे युक्त दो २ १/३ से, पाँचमें भाग लेनेसे क्या होता है और एकके तृतीयांश १/३ का छठे १/६ में भाग लेनेसे क्या होता है ? सो हमसे कहो ॥ ७ ॥
न्यासः- २ १/३ ५/१ । १/३ १/६ यथोक्त करणेन
जातम्- १५/७ । १/२
फैलाव-२ १/३ ५/१ यहां पहली राशिका भागानुबन्ध किया अर्थात् हर ३ तीनसे दो २ को गुणा किया तब ६ छह हुए. इसमें अंश १ एकको जोड दिया तब ७/३ ५/१ ऐसा रूप हुआ. फिर उपरोक्त नियमानुसार भाजकके हर ३ तीनको अंशके स्थानमें लिखा और अंश ७ सातको हरके स्थानमें लिखा. ३/७ ५/१ फिर गुणनकी विधि करी अर्थात् अंशको अंशसे और हरको हरसे गुणा किया तब १५/७ ऐसा रूप हुआ. अब यहां अंशमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि होगी वही उत्तर है ॥
तथा १/३ १/६ यहां भाज्यमें हर अंशका परिवर्तन किया तब ३/१ १/६ ऐसा रूप हुआ. गुणनविधि करी तब ३/६ ऐसा रूप हुआ. यह तीन ३का परिवर्तन दिया तब १/२ यह उत्तर हुआ ॥
इति भिन्नभागहारः ॥
अथ भिन्नवर्गादौ करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्-
अब भिन्न वर्ग, घन इत्यादि करनेका सूत्र आधे श्लोकमें-
वर्गे कृती घनविधौ तु घनौ विधेयौ
हारांशयोरथ पदे च पदप्रसिद्धयै ॥ ५ ॥
अन्वयः-भिन्नवर्गे हारांशयोः कृती विधेयौ । भिन्नघनविधौ तु घनौ विधेयौ । अथ पदप्रसिद्धयै हारांशयोः पदे विधेये ॥ ५ ॥
अर्थः-भिन्न वर्ग करना हो तो हरकी और अंशकी कृति ( वर्ग ) करे और यदि घन करना हो तो हर और अंशका घन करे और भिन्न राशियोंका वर्गमूल या घन-मूल जानना हो तो हर और अंश दोनोंका वर्गमूल तथा घनमूल ले ॥ ५ ॥