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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

गणितपाशव्यवहारः । (२४३)
अन्यत्करणसूत्रं वृत्तद्वयम्-
अंकपाशी और रीति २ श्लोक-
निरेकमंकैक्यमिदं निरेकस्थानांतमेकापचितं विभक्तम् ॥८०॥
रूपादिभिस्तन्निहतैः समाः स्युः संख्याविभेदा नियतेऽक-
योगे ॥ नवान्वितस्थानकसंख्यकाया ऊनेऽकयोगे कथितं
तु वेद्यम् ॥ ८१ ॥ संक्षिप्तमुक्तं पृथुताभयेनानान्तोऽस्ति
यस्माद्गणितार्णवस्य ॥ऽऽ॥
अन्वयः-अङ्कैक्यं निरेकं कार्यम् इदं निरेकस्थानान्तम् एका पचितं लेख्यम् । ततः
रूपादिभिः विभक्तं कार्यम् । तन्निहतैःअंकैः नियते अंकयोगे समाः संख्याविभेदाः
स्युः । कथितं तु नवान्वितस्थानसंख्यकाया ऊने अंकयोग वेद्यम् । पृथुताभयेन एतत्
संक्षिप्तम् उक्तं यस्मात् गणितार्णवस्य अन्तः न अस्ति ॥'८१ ॥
अर्थः-प्रश्नमें सब स्थानोंके अंकोंका जो योग हो उसमें एक एक घटाता हुआ।
जितने स्थानोंमें प्रश्नकर्त्ताने अंक दिये हों; उससे एक स्थान कममें लिखे और
उनके नीचे एक आदि अंकोंका हर लगावे, फिर अंशोंका और हरोंका परस्पर घात
करके अंशोंके घातमें हरोंका घातका भाग दे जो लब्धि मिले वही दिये हुए नियत
अंकोंके भेद होंगे. परन्तु यह रीति वही होगी, जहां नौ और दिये हुए अंकोंके
स्थानोंका योग प्रश्नके अंकोंके योगसे बडा होगा.अतिविस्तार होजानेके भयसे यहां
संक्षेपसे कहा है क्योंकि, गणितरूपी समुद्रका तो पार ही नहीं है ॥ ८१ ॥
उदाहरणम्-
पञ्चस्थानस्थितैरंकैर्यद्ययोगस्त्रयोदश ॥
कतिभेदा भवेत्संख्या यदि वेत्सि निगद्यताम् ॥
अन्वयः-पञ्चस्थानस्थितैः अंकैः यद्यद्योगः त्रयोदश तेषां कतिभेदा संख्या भवेत्
यदि वेत्सि तर्हि निगद्यताम् ॥
अर्थः-पांच स्थानोंमें रक्खे हुए जिन जिन अंकोंका योग तेरह होता है, उनके
भेदोंकी संख्या कितनी होगी ? यदि जानते हो तो कहो ॥