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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

( २४० ) लीलावती ।
अठाईस हजार आठसौ ३६२८८०० हुए, यही दशभुज शिवजीकी मूर्तियोंके भेद
होंगे. इसीप्रकार विष्णु भगवान्‌की मूर्तियोंके भेद जाननेके लिये एकादि १ । २ । ३
। ४ पर्य्यन्त अंकोंका घात किया तो २४ हुए, यही चतुर्भुज विष्णु भगवान्‌की
मूर्तियोंके भेद हुए.
विशेषे करणसूत्रं वृत्तम्-
दिये हुए अंकोंके भेद जाननेकी विशेष रीति एक श्लोक-
यावत्स्थानेषु तुल्यांखास्तद्भेदैस्तु पृथक्कृतैः ॥
प्राग्भेदा विहृता भेदास्तत्संख्यैक्यञ्च पूर्ववत् ॥ ७९ ॥
अन्वयः-यावत्स्थानेषु तुल्यांकारः स्युः तद्भेदैः तु पृथक्कृतैः विहृताः प्राग्भेदाः
भेदाः स्युः तत्संख्यैक्यं च पूर्ववत् साध्यम् ॥ ७९ ॥
अर्थः-जितने स्थानोंमें एकसे अंक हों उनके अलग भेद लाकर उसका पहली
रीतिसे लाये हुए सब अंकोंके भेदमें भाग दे जो लब्धि हो वही भेदोंकी संख्या
होगी और भेदोंकी संख्याओंको योग पहली रीतिसे लावे ॥ ७९ ॥
अतोद्देशकः-
इस विषयका उदाहरण-
द्विद्व्येकभूपरिमितैः कति संख्यकाः स्युस्तासां युतिश्च
गणकाऽऽशु मम प्रचक्ष्व ॥ अम्भोधिकुम्भिशरभूतशरै-
स्तथांकैश्चेदंकपाशमिति युक्तिविशारदोऽसि ॥ ५२ ॥
अन्वयः-द्विद्व्येकभूपरिमितैः तथा अम्भोधिकुम्भिशरभूतशरैः अंकैःकतिसंख्यकाः
स्युः तासां युतिः च का स्यात् । हे गणक ! चेत् अंकपाशमिति युक्तिविशारदः असि
तर्हि मम आशु प्रचक्ष्व ॥ ५२ ॥
अर्थः-दो दो एक एक २ । २ । १ । १ के तथा चार, आठ, पांच, पांच, पांच
४ । ८ । ५ । ५ । ५ के कितने भेद होंगे ? और उनका योग भी क्या होगा ? हे
गणक ! यदि अंकपाशके गणितमें चतुर हो तो मुझसे शीघ्र कहो ॥ ५२ ॥
न्यासः-२ । २ । १ । १ अत्र प्राग्वद्भेदाः २४ याव-
त्स्थानेषु तुल्यांका इति । अथैवं प्रथमं तावत्स्थानद्वये
तुल्यौ प्राग्वत्स्थानद्वयाज्जातौ भेदौ २ । पुनरत्रापि
स्थानद्वये तुल्यौ तत्राप्येवं भेदौ २ भेदाभ्यां प्राग्व-