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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

छायाव्यवहारः । ( २१३ )
न्यासः-छायान्तरं १९ कर्णा-
न्तरम् १३ अनयोर्वर्गान्त-
रेण १९२ भक्ता रसाद्रीषवः
५७६ लब्धं ३ सैकस्या ४ स्य
मूलम् २ अनेन कर्णान्तरं गुणितम् २६ द्विःस्थं २६
छायान्तरेण १९ ऊनयुते ७ । ४५ तदर्द्धे लब्धे छाये ७/२
४५/२ तत्कृत्योर्योगपदमित्यादिना जातौ कर्णौ २५/२ ५१/२
फैलाव-छायाओं और कर्णोंका अन्तर जानकर छायाओंका और कर्णोंका
प्रमाण जानना है; तहां पहले छायाओंका
प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके
अनुसार छायाओंके अन्तर १९ का वर्ग
किया तब ३६१ हुए और कर्णोंके अन्तर
१३ का वर्ग किया तब १६९ हुए; इन
दोनों ३६१ । १६९ का अन्तर किया तो १९२ हुए, इसका पांचसौ छियत्तर ५७६
में भाग दिया तब ३ लब्धि हुए, इसमें १ एक जोडा तब ४ चार हुए, इसका
मूल लिया तब २ मिले, इससे कर्णान्तर १३ को गुणा करा तब २६ हुए,
इसको दो स्थानोंमें २६ । २६ लिखा एक स्थान छायांतर १९ को घटाया तो ७
सात शेष रहे, फिर दूसरे स्थानमें छायांतर १९ को जोडा तब ४५ हुए, इन
दोनोंको आधा करा तब ७/२ ४५/२ हुए, यही दोनों छायाओंका प्रमाण है, फिर
छाया और शंकुसे “तत्कृत्योर्योगपदम्” इस पहले कही हुई रीतिके अनुसार
कर्णोंका प्रमाण २५/२ ५१/२ मिला ॥
छायांतरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्-
छाया जाननेकी दूसरी रीति आधा श्लोक-
शंकुः प्रदीपतलशंकुतलान्तरघ्न-
श्चाया भवेद्विनरदीपशिखौच्यभक्तः ॥ऽऽ॥
अन्वयः-प्रदीपतलशंकुतलांतरघ्नः शंकुः विनिरदीपशिखौच्यभक्तः कार्य्यः तदा
छाया भवेत् ॥ ऽ ऽ ॥