लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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१० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेध ३ \frac{०}{ } से गुणा करां तब \frac{२०००}{३} हुए
हरका भाग दिया तब ६६६ \frac{२}{३} हुए; यही घनहस्त फल अर्थात् खारियोंका
प्रमाण है ॥
अथ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणसंलग्नराशिप्रमाणानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
अब मकानके भीतर दो दीवारोंके जोडके कोनेमें डाली हुई, एक दीवारसे
लगाकर डाली हुई, दीवारके बाहरके कोनेसे लगाकर डाली हुई, स्थूलधान्य
और अणुधान्य शूकधान्यकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नात्तु परिधेः फलम् ॥
भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः स्वगुणभाजितम् ॥ ५९ ॥
अन्वयः-भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः परिधिः द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नः कार्य्यः स
एव परिधिः कल्प्यः । परिधेः पूर्ववत् फलं साध्यं तत् स्वगुणभाजितम् फलम्
भवति ॥ ५९ ॥
अर्थः-जो ढेर दीवारसे लगा हो, या दीवारके भीतर कोनेमें लगा हो या
दीवारके बाहर कोनेमें लगा हो उसकी परिधिको यदि स्थूलधान्यकी ढेरी हो तो
दोसे गुणा करे; सूक्ष्म ढेरी हो तो चारसे गुणा करे; और शूकधान्यकी ढेरी हो
तो १ \frac{१}{३} तीसरा भागयुक्त एकसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसीको क्रमसे
परिधि माने; फिर परिधिसे पहली रीतिके अनुसार फल लावे जो फल आवे उसमें
जिस जिस अङ्कसे परिधिको गुणा करा था उन ही उन अंकोंका भाग दे जो
लब्धि हो उसको फल जाने ॥ ५९ ॥
उदाहरणम्-
परिधिर्भित्तिलग्नस्य राशेत्रिंशत्करः किल ॥
अंतःकोणस्थितस्यापि तिथितुल्यकरः सखे ॥ ३९ ॥
बहिःकोणस्थितस्यापि पंचघ्ननवसम्मितः ॥
तेषामाचक्ष्व मे क्षिप्रं घनहस्तान् पृथक्पृथक् ॥ ४० ॥
अन्वयः- हे सखे ! किल भित्तिलग्नस्य राशेः त्रिंशत्करः परिधिः अन्तकोण-
स्थितस्य अपि राशेः तिथितुल्यकरः परिधिः बहिः कोणस्थितस्य अपि राशेः
पंचघ्ननवसंमितिः परिधिः अस्ति तेषां घनहस्तान् मे पृथक्पृथक् क्षिप्रम्
आचक्ष्व ॥ ३९ ॥ ४० ॥