लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संख्या होती है ईंटके लम्बाव और चौडावके घातको ईंटकी उँचाईसे गुणा करे तो
ईंटका घनफल मिलता है इसी तरहसे प्रस्तरकी चितिमें भी जानना ॥ ५४ ॥
उदाहरणम्-
अष्टादशांगुलं दैर्घ्यं विस्तारो द्वादशांगुलः ॥
उच्छ्रितित्र्यंगुला यासामिष्टिकास्ताश्चितौ किल ॥ ३४ ॥
यद्विस्तृतिः पञ्चकराष्टहस्तं दैर्घ्यं च यस्यां त्रिकरोच्छ्रितिश्च ॥
तस्यां चितौ किं फलमिष्टिकानां संख्या च का ब्रूहि कति
स्तराश्च ॥ ३५ ॥
अन्वयः-यासां दैर्घ्यम् अष्टादशांगुलम् विस्तारः द्वादशांगुलः उच्छ्रितिः त्र्यंगुला
ताः इष्टिकाः चितौ सन्ति । यद्विस्तृतिः पञ्चकरा यस्यां दैर्घ्यम् अष्टहस्तम् उच्छ्रितिः
च त्रिकरा तस्यां चितौ फलं किम्, इष्टिकानां संख्या च का, स्तराः च
कति ? इति ब्रूहि ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
अर्थः-जिन ईंटोंकी लम्बाई अठारह १८ अंगुल है, चौडाई बारह १२ अंगुल है
उँचाई ३ तीन अंगुल है, ऐसी ईंटें जिस चौतरेमें हैं उसकी चौडाई पांच ५ हाथ
है, लम्बाई ८ हाथ है, उँचाई ३ हाथ है, तो उस चौतरेमें फल क्या होगा ? ईंटोंकी
संख्या क्या होगी ? और तर कितने होंगे ? यह कहो ३४ ॥ ३५ ॥
न्यासः-
इष्टिकाया घनहस्तमानम् ३/६४
चितेः क्षेत्रफलम् ४० उच्छ्रयेण
गुणितं चितेर्घनफलं १२०
लब्धा इष्टिकासंख्या २५६०
स्तरसंख्या २४ एवं पाषाणचयेऽपि ॥ इति चितिव्यवहारः ॥
फैलाव-यहां चौतरेका घनफल जाननेके लिये पहले कहे हुए सम चतुर्भुज क्षेत्रफ-
लं ३ लको लानेके नियमके अनुसार चौतरे
लम्बाई ८ और चौडाई ५ का घात किया
तो ४० चालीस हुए, फिर इसकी ऊँचा
३ से गुणा किया तो १२० हुए यही
चौतरेका घनफल हुआ, इस १२० में
ईंटोंके घनफल अर्थात् ईंटोंकी लम्बाई