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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

क्षेत्रव्यवहारः। (१९३)
न्‍यास:
साढे बारहसौमा भाग कमती रहता
तो भी अङ्क लाघवके अर्थ ७५४ कोई
सूक्ष्म परिधि माना, इस परिधिका
अठारहमा भाग ४२ बयालीस हुआ
यही पहिला धनुष हुआ परन्तु इस
धनुषमें भी १/२८ दोका अठारहवां
भाग हीन है तथापि गणितकी सुग-
मताके अर्थ इसको ही ४२ पहिला
धनुष माना यही अङ्क दुगुना कर-
नसे दूसरा तिगुना करनैसे
तीसरा; चौगुना करनेसे चौथा, पँचगुना करनेसे पांचवां; छ गुणा करनेसे छठा
सात गुना करनेसे, सातवां आठ गुना करनेसे और आठवाँ नौगुणा करनेसे नौव
धनुष होता है; अथवा क्रियालाघवके अर्थ परिधिके अठारहवें भाग अर्थात् प्रथम
धनुष४२ का परिधि हुआ तथा सब धनुषोंका परिवर्तन दिया तब परिधिका प्रमाण
१८ हुआ; तथा अपवर्तित धनुषोंके प्रमाण १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८।
९। हुए; अब इन ही धनुषोंसे जीवाओंके प्रमाण जाननेके लिये; ऊपर कही हुई
रीति के अनुसार प्रथम धनुषको परिधि १८ मेंसे घटाया तो १७ शेष रहे; इनको
धनुष १ से गुणा किया तो १७ हुए; इस अंककी प्रथम संज्ञा है फिर परिधि १८
का वर्ग किया तो ३२४ हुए; इसका चौथाई ८१ हुआ इसको पांचसे गुणा किया
तो ४०५ हुए; इसमें पहले साधे हुए प्रथम १७ को घटाया तो ३८८ बचे;
इसका चौगुने व्यास ९६० से गुणा करे हुए प्रथमसंज्ञक अंक १६३२० में भाग
दिया तब ४२मिले; यह पहिली जीवाका प्रमाण हुआ; यहां भाग देनेके अनन्तर २४
शेष रह जाता है; परन्तु थोडे अन्तरके कारण सावयव नहीं लेते हैं; इसी प्रकार
प्रथमसंज्ञक अंकको सिद्ध कर ऊपर कही हुई रीति के अनुसार सब धनुषोंकी जीवा
क्रमसे ४२। ८२। १२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० हुई॥
अथ चापानयनाय करणसूत्रं वृत्तम्-
व्यास और जीवा जानकर चापजाननेकी रीति एक श्लोकमें-
व्यासाब्धिघातयुतमौर्विकया विभक्तो जीवांघ्रिपञ्चगुणितः
परिधेस्तु वर्गः ॥ लब्धोनितात्परिधिवर्गचतुर्थभागादात्ते
पदे वृतिदलात्पतिते धनुः स्यात् ॥ ५० ॥
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