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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

( १९२ ) लीलावती ।
अन्वयः-यत्र व्यासदलं खार्कैः मितम् यत्र चापं च वृत्तेः अष्टादशांशेन समानम् ।
तत्र एकादिनिघ्नेन वृत्तेः अष्टादशांशेन समानं चापं तथा जीवां च पृथक् पृथक्
आशु वद ॥ २८ ॥
अर्थः-जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका आधा १२० है. अर्थात् व्यासका प्रमाण २४०
दोसौ चालीस है और धनुषका प्रमाण परिधिके अठारहमें भागके समान है; तहां उस
धनुषकी जीवा कहो और एक, दो, तीन, चार, पांच, छ, सात, आठ और नौ
आदिसे गुणा किये हुए उसी धनुषकी जीवा भी अलग अलग कहो ॥ २८ ॥
व्यासः व्यासदलम् १२० व्यासः २४०
धनुः ४२ अत्र किलांकलाघवाय विंशतेः
१२० सार्द्धार्कशतांश २०/१२६० मिलितः
व्यासार्द्ध. सूक्ष्मपरिधिः ७५४ अस्याष्टा-
२४० दशांशः ४२ अत्राप्यंकला-
२३६ घवाय द्वयोरष्टादशांश २/१८
२२६ युतो गृहीतः अनेन पृथक्
२०८
१८४
१५४
१२०
८२
४२
पृथगेकादिगुणितेन तुल्ये धनुषि कल्पिते ज्याः साध्याः ॥
अथवाऽत्र सुखार्थं परिधेरष्टादशांशेन परिधिं धनुषि चापव-
र्ग्य ज्याः साध्यास्तथापि ता एव भवंति अपवर्तिते न्यासः-
परिधिः १८ चापानि च १। २। ३। ४। ५। ६। ७।
८। ९ यथोक्तकरणेन लब्धा जीवाः ४२। ८२ ।
१२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० ॥
फैलाव-इस वृत्तक्षेत्रके व्यासका प्रमाण २४० है अब इसी व्याससे परिधि जान-
नेके लिये पहले कही हुई "व्यासे भनंदाग्नि'-इत्यादि क्रिया करी तो परिधिका
प्रमाण ७५४. मिला, परन्तु यहाँ ७५४ परिधि, २०/१२६० यह भाग अर्थात् बीसका