लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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अन्वयः-हे सखे ! किल यत्र विष्कम्भमानं सप्त तत्र परिधेः प्रमाणं तथा यत्परि-
धिप्रमाणं द्वाविंशतिः तद्व्याससंख्यां च विचिन्त्य प्रचक्ष्व ॥ २४ ॥
अर्थः-हे मित्र ! निश्चय जहाँ वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण ७ है तहां परिधिका
प्रमाण क्या होगा ? तथा जिस वृत्तक्षेत्रकी परिधिका प्रमाण २२ है उसके व्यासका
क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ २४ ॥
न्यासः-
व्यासमानम् ७
लब्धं परिधिप्रमाणम्
२१ १२३९/१२५० स्थूलो वा परिधिः
लब्धः २२
अथवा परिधितो व्यासानयनाय
गुणहारविपर्ययेण व्यासमानम्
सूक्ष्मम् ७ ११/३९२७
स्थूलं वा ७
फैलाव-इस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका मान ७ सात है; इस व्यास मानको जानकर
परिधिका मान जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "व्यासे भनन्दाग्नीत्यादि" रीतिके
अनुसार इष्ट माने हुए व्यासमान ७ सातको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे
गुणा किया तब २७४८९ हुए; इसमें १२५० एक हजार दोसौ पचासका भाग
दिया; तब २१ १२३९/१२५० मिले; यही परिधिका प्रमाण है; परन्तु
यह सूक्ष्मपरिधिका प्रमाण है, स्थूलपरिधि जाननेके निमित्त
ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यासमान ७ सातको २२
बाईससे गुणा किया तब १५४ हुए; इनमें ७ सातका भाग
दिया तब २२ लब्ध हुए यह भी परिधिका ही प्रमाण है परन्तु यह स्थूल अर्थात
व्यवहार योग्य परिधिका मान है ॥