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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

क्षेत्रव्यवहारः। (१७३)
अन्वयः-लम्बतदाश्रितबाह्वोः मध्यम् अस्य लम्बस्य सन्ध्याख्यम् । सन्ध्यूना भूः
पीठं यस्य अधरं खण्डं साध्यम् ॥ ३५ ॥
अर्थः-लम्ब और लम्बको स्पर्श करनेवाली भुज इनके मध्यका भाग इसी लंबकी
संधि कहलाता है भूमिमें संधि घटानेसे शेषकी पीठ संज्ञा है; जिसका कि,अधरखण्ड
साधना है ॥ ३५ ॥
सन्धिर्द्विःस्थः परलम्बश्रवणहतः परस्य पीठेन ॥
भक्तो लम्बश्रुत्योर्योगात्स्यातामधः खण्डे ॥ ३६ ॥
अन्वयः-द्विःस्थः सन्धिः परलम्बश्रवणहतः कार्य्यः । ततः परस्य पीठेन भक्तः
कार्य्यः तदा लम्बश्रुत्योः योगात् अधः खण्डे स्याताम् ॥ ३६ ॥
अर्थः-सन्धिका दो स्थानोंमें लिखे, एकस्थानमें परलंबसे गुणा करे और दूसरे
स्थानमें निजकर्णसे गुणा करे; तदनन्तर दोनों स्थानोंमें परपीठका भाग दे,तब लम्ब
और कर्णके योगसे नीचेके खण्ड होते हैं ॥ ३६ ॥
न्यासः-लम्बः १८९ तदाश्रितभुजः १९५ । अनयोर्मध्ये
“यल्लम्बलम्बाश्रितबाहुवर्ग "इत्यादिनागताबाधा सन्धि-
संज्ञा ४८ तदूनितभूरिति द्वितीयाबाधा सा पीठसंज्ञा२५२
एवं द्वितीयलम्बः २२४तदाश्रितभुजः २६० पूर्ववत्सन्धिः
१३२ पीठम् १६८ अथाद्यलम्बस्या १८९ धः खण्डं
साध्यम् । अस्य सन्धिः ४८ द्विःस्थः ४८ परलम्बेन २२४
श्रवणेन च २८० पृथग्गुणितः १०७५२ । १३४४०
परस्य पीठेन १६८ भक्तो लब्धं लम्बाधःखण्डम् ६४
श्रवणाधःखण्डञ्च ८० एवं द्वितीयलम्बस्य २२४ सन्धिः
१३२ परलंभेन १८९ कर्णेन च ३१५ पृथग्गुणितः
परस्य पीठेन २५२ भक्तो लम्बाधःखण्डम् ९९ श्रवणा-
धःखंडं च १६५ ॥
फैलाव-ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें सन्धि अर्थात लम्ब और लम्बको आश्रय करने-
वाली भुजके मध्यका प्रमाण जाननेके निमित्त उपरोक्त नियमानुसार लम्ब १८९
और उसी लम्बको आश्रय करनेवाले भुज १९५ इन दोनोंके मध्यका प्रमाण
“यल्लम्बलम्बाश्रितबाहुवर्गेत्यादि" इस रीतिके अनुसार लम्ब१८९ और भुज १९५