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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 268 में से

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पृष्ठ 185

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६९ )
पहले की कोटि ४ से दूसरेके कर्ण १३ को गुणा किया तब ५२ हुए; यही वहां
तीसरा भुज है तदनन्तर दूसरेकी कोटि १२ से पहलेके कर्ण ५ को गुणा किया
तब ६० हुए; यही तहां चौथा भुज है; इस प्रकार चारों ३९ । २५।५२ । ६० भुज
सिद्ध हो जाते हैं; इनमें जो सबसे अधिक अंक ६० है; वह भूमिका प्रमाण है और
सबसे कम अङ्क २५ है वह मुखका प्रमाण है; शेष दोनों ३९ । ५२ भुजोंके प्रमाण
हैं; इस प्रकार यदि विषमचतुर्भुज बनाया गया तब वही पूर्वोक्त बन गया; यहाँ यह
६३ । ५६ दोनों कर्ण प्राचीनोंने बड़े गौरवसे सिद्ध किये हैं परन्तु हम इन ही
दोनों कर्णोंको अति सरल रीतिसे लाते हैं उन ही दोनों जात्यत्रिभुजोंके भुज और
कोटियोंका उत्तरोत्तर घात किया अर्थात् पहलेका भुज ३ और दूसरेकी कोटि १२ का
घात किया तब ३६ हुए; और पहलेकी कोटि ४ और दूसरेका भुज ५ इनका घात
किया तब २० हुए, इन दोनों गुणनफलों ३६ । २० को जोडा तब ५६ हुए यही
पहला कर्ण है फिर दोनोंके घात और दोनोंके कोटियोंके घातका योग किया जैसे
दोनोंकी भुजों ३ । ५ का घात किया, तब १५ हुए दोनोंकी कोटियों ४ । १२
का घात किया तब ६३ हुए इन दोनों भुज घात १५ और कोटि घात ४८ का
योग किया तब ६३ हुए यही दूसरे कर्णका प्रमाण है; इस प्रकार अनायास लघु
रीतिसे वही दोनों ६३ । ५६ लब्ध हो गये ॥
अब इसी विषमचतुर्भुजसे उन दोनों जात्यत्रिभुजोंके
निकालनेकी रीति लिखते हैं, जिनसे यह विषम बना था।
किसी कर्ण अंकका अर्थात् दो अंकोंके वर्गयोगके मूलका मुख और भूमिमें
अर्थात् सबसे छोटे और सबसे बड़े भुजमें भाग देय; तब जो लब्धि मिले वही
भुज और कोटि हैं फिर इन ही लाये हुए भुज और कोटिसे कर्णका प्रमाण
पहले कही हुई “तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः” इस रीतिसे लावे और इसी लाये हुए
कर्णका विषमचतुर्भुजके बाकी बचे दोनों भुजोंमें भाग दे; तब जो लब्धि मिले
वह दूसरे त्र्यस्रके भुजकोटिका प्रमाण होगा यह वही दूसरा क्षेत्र है कि, जिसके
कर्णका भूमि और मुखमें भाग दिया था अर्थात् पहले
माना हुआ कर्णही दूसरे क्षेत्रका कर्ण होता है, वही
क्षेत्रपर दिखाते हैं ॥
यहां पहले पांच ५ को कर्ण माना इसका सबसे छोटे
भुज २५ में भाग दिया तब ५ मिले सबसे बड़े ६० में